जेएनयू की कहानी में एक दिलचस्प मोड़ आया है. जिस उमर खालिद व उसके साथियों को दिल्ली पुलिस पूरे भारत में खोज रही थी, वो उमर खालिद व उसके साथी रविवार को जेएनयू कैम्पस में छात्रों को संबोधित कर रहे थे और पुलिस को ललकार रहे थे कि –आओ हमें गिरफ़्तार कर लो…

इस घटनाक्रम के बाद जेएनयू कैम्पस में फिर से गहमा-गहमी बढ़ गई है. अब तक इस लड़ाई अलग-अलग छात्र-संगठन के लोग थे, लेकिन अब इस लड़ाई में जेएनयू के आम छात्र भी शामिल हो गए हैं.

TwoCircles.net ने सोमवार जेएनयू कैम्पस में दर्जनों छात्र-छात्राओं से बात की. इनकी बातों ने यह साबित कर दिया कि अब इस लड़ाई में आम छात्र भी कूद चुके हैं, क्योंकि जेएनयू की बदनामी किसी को किसी भी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं है.

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जेएनयू से एम.फिले कर रहे छात्र शायन का कहना है कि –‘सारे कॉमरेड के लौट आने की ख़बर आते ही हज़ारों छात्र जमा हो गए. सुबह से तमाम स्टूडेंट यहां खड़े हैं. इन्हें कोई ऑर्गनाइजेशन मोबलाइज़ नहीं कर रहा है.’

वो बताते हैं कि –‘जेएनयू को एक साज़िश के तहत बदनाम किया जा रहा है. कैम्पस में जो कुछ भी हुआ है, उसको कैम्पस में ही निपटाया जा सकता था.’

इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया के रोल को लेकर छात्रों में काफी गुस्सा है. यहां के छात्रों का स्पष्ट तौर पर मानना है कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ करके टीवी चैनलों पर चलाया गया. उमर खालिद को एक मुस्लिम युवा होने के नाते जानबुझ कर टारगेट किया किया, क्योंकि कन्हैया कुमार हिन्दू नाम होने की वजह से ‘देशद्रोही’ के चेहरे में फिट नहीं बैठ रहे थे.

शायन बताते हैं कि –‘बीजेपी व आरएसएस के लोगों ने इस मामले को तुल दिया. पूरे मुनिरका में उमर का पोस्टर लगाया ग. जिस पर लिखा था –‘उमर ख़ालिद जहां मिले, गोली मार दो…’ इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी एक टीम दिन-रात लगकर जेएनयू के छात्रों को देशद्रोही बताने में जुटी रही.

वो कहते हैं कि –‘अगर सच में मीडिया में अगर कोई सबूत है, तो उसको दिखाए. लेकिन इन्हें बग़ैर किसी सबूत के फ़र्ज़ी वीडियो के आधार पर जजमेंट देने का अधिकार किसने दे दिया?’

जेएनयू के ही एक दूसरे छात्र सूर्य प्रकाश का कहना है कि –‘मीडिया वालों ने जेएनयू को इस क़दर बदनाम किया कि अब कोई ऑटो वाला जेएनयू आने को तैयार नहीं हो रहा है. हद तो तब हो गई कि एक ऑटो वाले एक लड़की को पाकिस्तानी बताकर उसके मुंह पर थूक दिया. खैर, उन बेचारों को क्या पता कि हम हमेशा उनके ही हक़ के लिए लड़ते आए हैं.’

वो बताते हैं कि –‘आरोप यहां के 10 छात्रों पर है. लेकिन सिर्फ उमर खालिद को ही टारगेट किया जा रहा है, क्योंकि वो मुसलमान है. ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए.’

अमृता कुमारी का कहना है कि –‘जेएनयू के तमाम छात्रों से सेडिशन के सारे आरोप सरकार जल्द से जल्द हटाए. स्लोगन और राजनीति का साथ शुरू से रहा है. हर लोकतांत्रिक समाज में डिबेट का, बहस का, असहमति का अधिकार हमेशा रहना चाहिए. इसे ख़त्म नहीं किया जा सकता. हमारा मानना है कि ये मामला जेएनयू का एक ‘पॉलिटिकल टार्गेटिंग’ का है.

अमृता की दोस्त अनन्या बताती हैं कि –‘इस मामले की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार किया जा चुका था. आरएसएस का मुखपत्र ‘पाञ्चजन्य’ पिछले दो साल से आर्टिकल छाप रहे थे कि जेएनयू में किस प्रकार सोशल डिस्क्रिमिनेशन की पढाई हो रही है. यहां जेंडर को लेकर एक अलग से डिपाटमेंट है. यहां पर इक्वल अपरच्यूनिटी सेल है. यहाँ पर जीएस केस है. इसलिए जेएनयू एंटी-नेशनल है.’

यहां पीएचडी कर रहे राकेश का कहना है कि –‘सरकार ये कैसे कर सकती है? और मीडिया ने तो अपना पूरा स्तर ही गिरा दिया है. जहाँ एक तरफ़ जेएनयू के छात्रों को पूरी दुनिया इंटेक्चुअल की नज़र से देखती है, वहीं मीडिया और कुछ दलों ने इसे देशद्रोही बना दिया है. जबकि सच्चाई यह है कि असल देशद्रोही यहीं हैं.’

रागिनी जो कि एक ब्लाइंड स्टूडेंट हैं, बताती हैं कि –‘मेरे लिए जेएनयू भगवान के घर जैसा है. जेएनयू ने मुझे एक अलग सोच, एक अलग दिशा में, देशहित और समाज के उन मुद्दों पर सोचने को मजबूर किया, जिसको सरकार हमेशा नज़रअंदाज़ करती है. अगर यहां डिसेन्ट व डिस्कशन नहीं रहेगा, तो यह यूनिवर्सिटी ही मर जाएगी. यूनिवर्सिटी होता है चीज़ों को सीखने के लिए, धारणाओं को अंडरलाइन कर समझने के लिए.’

इस प्रकार TwoCircles.net ने यहां जितने भी छात्र-छात्राओं से मुलाक़ात की, उनका स्पष्ट तौर पर कहना था कि आरएसएस के इशारे पर चलने वाली यह सरकार जेएनयू को बदनाम करके इसे बंद करने या फिर छात्रों को डराकर उनके सोचने-समझने की सलाहियत को ख़त्म करने की साज़िश रच रही है, क्योंकि यहां के छात्र हमेशा से इनके ‘देशद्रोही’ विचारधारा के ख़िलाफ़ रहे हैं. लेकिन जेएनयू के छात्र हार मारने वाले नहीं है, अब इस सरकार व उनके विचारधारा की हक़ीक़त पूरी दुनिया को बताई जाएगी.


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