bags-main

आपने नन्हे मुन्नों के काँधे पर उनके वजन से अधिक बड़ा बस्ता देखा होगा जिसे देखकर मासूमों पर दया आती है.वैसे अगर मानको की बात मानी जाये तो उसके अनुसार कंधों पर टंगे बस्ते का वजन बच्चों के वजन से दस गुना कम होना चाहिए। लेकिन, ऐसा नहीं हो रहा। कंधे पर झूलता भारी भरकम बस्ता मानक को ठेंगा बीस से तीस फीसद तक भारी हो चला है।

सरकार द्वारा गठित कमेटी ने सुझाव दिए है की बच्चो की कॉपी का कागज पतला होना चाहिए तथा गत्ता और जिल्द चढाने का पेपर महीन होना चाहिए जिससे बस्ते का वजन कम किया जा सके. सीबीएसई भी बच्चों के दर्द को समझते हुए समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करता रहता है

गौरतलब है की बोर्ड ने 2004 में सर्कुलर जारी करते हुए कहा था कि कक्षा दो तक स्कूल बैग नहीं होना चाहिए। 2009 में दोबारा सर्कुलर जारी करते हुए कहा कि स्कूल केवल वही एनसीईआरटी द्वारा जारी की गईं किताबें लगाएं।

उनका कहना है कि एनसीईआरटी की पुस्तकों में विस्तृत जानकारी नहीं होती जबकि प्रतियोगी दौर में विद्यार्थियों से अपेक्षा की जाती है कि उनकी हर विषय पर पकड़ हो। ऐसे में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लगाना उनकी मजबूरी है।

केंद्र सरकार की गाइड लाइंस के प्रमुख बिंदु

  • – दूसरी कक्षा तक के बच्चो के लिए क्लास में ही कॉपी किताबें रखने की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • – अभिभावक ऐसे बैग खरीदें जो बच्चों के लिए आरामदायक हो।
  • – रिफरेंस बुक व अन्य किताबें बैग में नहीं होनी चाहिए।
  • – स्कूलों में क्लास लाइब्रेरी बनाई जाए। जो बच्चे किताब नहीं ला पाते, उन्हें लाइब्रेरी से किताब उपलब्ध कराई जाए।
  • – अभिभावकों से विचार-विमर्श करने के बाद टाइम टेबल इस तरह बनाएं जिसमें किताबों का बोझ कम से कम हो।
  • – नेशनल केरिक्यूलम फ्रेमवर्क 2005 में हर विषय की सिंगल नोट बुक, प्रतिदिन किताबें लाने के लिए दवाब न डालना, टाइम टेबल के अनुसार होमवर्क देना, केवल पुस्तकों के आधार पर पढ़ाई न कराना आदि बातें शामिल हैं।


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें