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जौवाद हसन की खास रिपोर्ट
गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है
इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है
चेहरे कई बेनकाब हो जाएंगे………….
ऐसी कोई बात ना पूछो तो अच्छा है

हकीकत तो ये है कि ठंड बढ़ जाए तो भी गरीब मरता है, बीमारी फैल जाए तो भी गरीब मरता है, धूप हो जाए तो भी गरीब मरता है, सारे संकट गरीबों को झेलने पड़ते हैं।

बिलकुल यही हाल है दिल्ली में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों का, इनके पास न रहने का स्थायी ठिकाना है, न नियमित काम और न ही बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम, और ठंडी में तो जीना ही हुआ हराम। क्योंकि कड़कड़ाती ठंड में ये लोग खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर है।

ऐसे ठंड में रोहिंग्या मुसलमानों से झुग्गियां खाली कराने के अभियान में ज़कात फाउंडेशन ने जिस बहादुरी के साथ कई झुग्गीयों तोड़ दिया, उनके कुररता भरे इस अभियान में गरीब रोहिंग्यों का जरा भी ख्याल नहीं था कि, ये गरीब इतनी ठंडी में असहाय होकर कहां जाएंगे। दरअसल पूरा मामला कंचनकुंज में 1100 गज जमीन जकात फाउंडेशन की है, जिसपर 300 रोहिंग्या परिवार 3 साल से जयादा से रह रहे है। अब अचानक जकात फांउडेशन यह जमीन खाली करवाना चाहती है।

हालांकि हमने बात करने कि कोशिश की तो पता चला की यहां पर जकात फांउडेशन यतीम खाना बनवाना चाहती है, अब इन्हें कौन समझा कि इनके अलावा इनको और कौन दूसरा यतीम नजर आने लगा। जिसे संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन दुनिया के सबसे सताए हुए लोगों में गिनती है।

ये बदनसीब लोग बड़ी तादाद में ये लोग अपना घर बार छोड़कर भागने पर मजबूर किये गए हैं । जो रहने खाने से लेकर रोजगार तक की समस्या से जूझ रहे हैं । कबीर अहमद का कहना है, UN की ओर से हमें वो सब नहीं मिलता जो अन्य शरणार्थियों को मिला है। उन्हें रहने के लिए जमीन जो जकात फाउंडेशन ने दी थी, अब वो कहती है खाली करों तो कभी पटवारी कहता है खाली करों, हांलाकि कुछ झुग्गी को ये लोग मिलकर खाली कर वा रहे है।

अपने वतन बर्मा से बंगलादेश होती हुई दिल्ली पहुंची तस्लीमा अपने पति और बच्चों के साथ किसी तरह जान बचाकर भारत आ तो गई लेकिन यहां जिन हालात में जी रही वह जीते जागते मरने जैसा है। कुछ एनजीओं दवाई आदि बांटने के लिए आते हैं, लेकिन किसी बड़ी बीमारी में इन्हें कोई मदद नहीं मिलती है।

यहां रहने वाले हारूण बताते हैं, बर्मा हम सभी लोग या तो किसान थे या कारोबारी। जिनके पास ज्यादा पैसा था वे सऊदी मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया चले गए। बहुत से लोग भारत आ गए। इनके किसी के पास रोजगार नहीं है। कबीर का कहना है कि, शरणर्थी कार्ड होने के बावजूद भी हमें किसी तरह की कोई सहायता नहीं मिल रही है। मोहम्मद हारूण का कहना है कि हमें कुछ नहीं चाहिए सिर्फ रहने को जमीन मिल जाए उसपर मकान खुद बना लेंगे।

गड्डे खेत व जंगल में इनके घर बने हैं। बरसात के वक्त इनकी झुग्गियों में पानी भर आता है, और सांप घुस आते हैं । अभी तक सांप काटने से तीन बच्चों की मौत हो चुकी है। ठंड में कपड़ा ना होने की वजह से बच्चे नंगे रहते है। पन्नी और पलाईबोर्ड की दीवारों से बना कमरा है, हांलाकि जगह कि किल्लत की वजह से कुछ दो फ्लोर का कमरा जिसमें सोना तो दूर बैठना भी मुश्किल है। कमरों में अंधेरा और बदबू, आस-पास कोई बाजार नहीं, कोई अस्पताल नहीं, बिजली नहीं, सड़के नहीं, यहां तक की खाने को रोटी नहीं। अगर कुछ खाने का बनता है तो सिर्फ उबला चावल और लौकी के पत्ते की सब्जी बनती है।

रोहिंग्या पर काम कर रहे दि स्परिट फांउडेशन नामी संस्था के अध्यक्ष मोहम्मद अनीसूर रहमान ने बताया, “जिस तरह से भारत में अन्य शरणार्थियों को सुविधाएं मिली हुई हैं, वैसी सुविधाए रोहिंगया मुसलमानों को नहीं मिली है। अगर फंड्स लेने की बात होती है कि बर्मा से आए मुसलमानों पर कौन-कौन सी संस्था काम कर रही है तो कई संस्था सामने आ जाती है, इनके नाम पर न जाने कितने एनजीओ पैसा कमा रहे हैं”।

असल में तो रोहिंग्या मुसलमान खाने को रोटी, तन बदन पर कपड़े व झुग्गी जैसे मकान तक से महरूम है। रहमान यहां रहने वाले बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं और अपनी जान-पहचान वालों से बच्चों को कॉपी, किताब, पेंसिल आदि दिलवा देते हैं।

गौरतलब है कि रोहिंग्या लोगों का संबंध बर्मा के अराकान कबीले से है जिसे राखिन के नाम से भी जाना जाता है, जहां इनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा बताई जाती है, और वे इस देश में सदियों से रहते आए हैं। लेकिन बर्मा के लोग और वहां की सरकार कभी इन्हें अपना नागरिक नहीं मानती है। वहां इन लोगों को ना जमीन जायदाद खरीदने का हक है, और न ही पढ़ने लिखने का उनके आने जाने पर भी कई तरह की पाबंदियां है।

यही नही, उन बहुसंख्यक बौद्ध लोगों के अत्यचारों की खबरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आती रही हैं। हारूण कहता है कोई नहीं चाहता कि व अपना देश अपना घर बार छोड़ कर ऐसे दर-दर की ठोकड़े खाता फिरे, लेकिन करें तो क्या करें उपर वाले ने हमारी किस्मत ऐसी ही लिखी है, वो आगे कहते है वहां जालिमों की तरह जुल्म होता है, पुलिस किसी को भी पकड़कर ले जाती है, डर व खौफ के मारे से कोई बाहर नहीं निकलता है, मेहनत मजदूरी भी नहीं कर सकते है।

रोहिंग्या युवक शकूर बताने लगे कि कुछ अधिकारी आते है, कभी पटवारी आता है, और जहग खाली करने के लिए कहते है, आखिर हम कहां जाए यूएनओ हमें बताए। यह अफसोसजनक बात है कि रोहिंग्या मुसलमान की बदहाली जस की तस हैं, जो इस बार भी सैकड़ों परिवार खुले में रात बिताने के लिए मजबूर है। उनके पास न ओढ़ने को कम्बल न बिछाने को बिछौने का इंतजाम है, और न ही पर्याप्त सर्दी के कपड़े, और बिमार हो जाने पर इलाज करवाने की सुविधा भी उनके पास नहीं है, ऐसे में जरूरत की चीजों के अभाव में ठंड का मौसम इन गरीब और बेघर लोगों पर बड़े कहर की तरह टूटता है।

हालांकि रोहिंग्या के बेघर लोगों की समस्या के संदर्भ में UN के साथ-साथ इन पर काम कर रही NGO को ये सोचना चाहिए कि रोहिंग्या गरीबों को ठंड में झोपड़ी उपलब्ध करवाने की आवश्यकता है। आज भी रोहिंग्या की बड़ी आबादी का एक अदद झोपड़ी के लिए तरसाना और मौसम की मार झेलना उन तमाम एनजीओ के सभी वादों पर प्रश्निचह्न लगाता है जो परेशान हाल और बेसहारा लोगों की मदद और उनके पुनर्वास के दावे करते नहीं थकते !!! (nagrikdarpan)


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