पिछले दिनों रेप पर दिए गये अपने बयान के कारण केंदीय मंत्री मेनका गाँधी काफी चर्चित रही, इन दिनों भी महिलाओं से सम्बंधित मुद्दों पर काफी खुलकर राय दे रही है.

मेनका गांधी के ताज़ा बयान पर बात करने से पहले आपको निजी अस्पतालों की हकीकत बताते है, जब आप किसी प्रेग्नेंट महिला को अस्पताल रेगुलर चेकअप के लिए लेकर जाते है तो सबसे पहले आपको पर्चा बनवाना होता है जिसकी कीमत और वैलिडिटी डॉक्टर की प्रसिद्धि पर निर्भर करती है मसलन के तौर पर अगर आप मेट्रो शहर में है तो मात्र पर्चा बनवाने में 500-800 रुपए तक खर्च करने पड़ते है और उस पर्चे की वैलिडिटी 7-10 दिन तक ही होती है अगर आप 11 वे दिन पेशेंट को चेकअप के लिए लाते है तो फिर आपको पर्चा बनवाना पड़ेगा, बताते चले की दवाई का खर्चा अलग है.

इसके बाद नंबर आता है पर्चे के घसीटदार भाषा में लिखी दवाई का जो की सिर्फ डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर वाले मेडिकल स्टोर पर ही मिलती है, अगर आप उसी पर्चे पर लिखी दवाई किसी और मेडिकल स्टोर पर ढूंढेने जांए तो या तो मेडिकल स्टोर वाले को दवाई ही समझ में नही आयेगी या उसके पास वो दवाई कभी नही मिलेगी. दरअसल होता यूं है की पर्चे पर जानबूझकर घसीटदार भाषा में दवाई का नाम लिखा जाता है जिससे की मरीज को साफ़ तौर पर समझ में ना आये, क्या आप उम्मीद कर सकते है की एक एमबीबीएस किया हुआ स्टूडेंट इतनी ख़राब हैण्ड राइटिंग में लिख सकता है और जब तक डॉक्टर स्टूडेंट होता है तब तक उसकी राइटिंग सही रहती है तथा प्रैक्टिस करते टाइम अचानक से खराब हो जाती है, अगर अधिक लिखने से हैण्डराइटिंग ख़राब हुआ करती तो सबसे अधिक ख़राब हैण्ड राइटिंग विद्यार्थियों की होती और इतनी ख़राब हैण्ड राइटिंग पर शायद पास होना भी मुश्किल होता.

पर्चे पर घिसत कर लिखने के दो कारण होते है पहला तो मरीज़ और अन्य मेडिकल स्टोर वालो की समझ में दवाई ना आये तथा कुछ डॉक्टर दवाई को अपनी खुद की बनायीं हुई शोर्टफॉर्म में लिखते है जो सिर्फ उनके मेडिकल स्टोर वाले की समझ में आती है, ताकि मरीज़ कहीं और से दवाई ना खरीदने लग जाये.

इसके बाद नंबर आता है मरीज़ को डराने और भयभीत करने का, आमतौर पर जब कोई प्रेग्नेंट महिला इनके पास जाती है तो सबसे पहले इनका फोकस होता है की किसी तरह क्लाइंट(पेशेंट) को बांधकर रखा जाए जिससे वो अगले 9 महीने तथा उसके बाद 2-3 महीने यही से चेकअप कराए तथा दवा ले. शुरू में मरीजों से अच्छे से बात करने वाली डॉक्टर्स डिलीवरी से 1-2 दिन पूर्व अचानक से कठोर हो जाती है और इन 1-2 दिनों में चलता है मरीज़ को डराने का खेल, जिसके पीछे मकसद होता है सिजेरियन ऑपरेशन का.

आइये पढ़ते है मेनका गांधी ने क्या बयान दिया है इस बारे में

(दैनिक जागरण में प्राकाशित मेनका गांधी का विजेंद्र बंसल द्वारा लिए गये इंटरव्यू का एक अंश- नीचे )

“निजी अस्पतालों व नर्सिंग होम ने सीजेरियन डिलीवरी को धंधा बना लिया है। इसके दुष्प्रभाव यह आ रहे हैं कि सीजेरियन दो ही बच्चे हो पाते हैं। जो परिवार ज्यादा बच्चे करना चाहते हैं, उनके रास्ते बंद हो जाते हैं। मैंने तो प्रधानमंत्री जी से भी इस बाबत बात कर ली है। केंद्र सरकार चिकित्सा सेवा को सस्ता करने के प्रयास में जुटी है। डॉक्टरों से जेनरिक दवा लिखवाने और स्टेंट के दाम में कटौती करना इसी के तहत सार्थक प्रयास हैं। एक साल में कितनी सीजेरियन डिलीवरी की, इसके आंकड़े भी नर्सिंग होम व निजी अस्पतालों के प्रबंधकों को बोर्ड पर लिखवाने होंगे। ताकि वहां डिलीवरी करवाने आने वालों को डॉक्टरों की योग्यता का पता चले। मुझे दुख तमिलनाडु के आंकड़े देखकर हुआ। वहां गत वर्ष 70 फीसद डिलीवरी सीजेरियन हुईं जबकि यह आंकड़ा 10 फीसद से अधिक नहीं होना चाहिए” 


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