नई दिल्ली,पठानकोट स्थित वायुसेना के आधार शिविर पर हुए बड़े आतंकवादी हमले ने उन आशंकाओं को सही साबित कर दिया जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ की जन्मदिन कूटनीति के बाद रक्षा और विदेशी मामलों के विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त की जा रही थीं कि अब भारत पाकिस्तान दोस्ती के विरोधी चुप नहीं बैठेंगे। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही होती तो भी संभाली जा सकती थी। चुनौती उससे भी ज्यादा गंभीर है। क्योंकि यह हमला आईएसआई के संरक्षण में पलने वाले लश्करे तैयबा या मुंबई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद की तंजीब जमात उद दावा द्वारा नहीं बल्कि जैश ए मोहम्मद के फिदाइनों द्वारा किया गया है जिसके संस्थापक मसूद अजहर को भारत की जेल से छुड़ाने के लिए ही काठमांडू से एअर इंडिया के विमान को अपह्रत करके कंधार ले जाया गया था। संयोग है कि तब भी केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा गठबंधन की ही सरकार थी। सरकार के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि इस हमले के मास्टर माइंड जैश संस्थापक मौलाना मसूद अजहर समेत कंधार कांड के अन्य अपराधियों को भारत सौंपे जाने की मांग भी पाकिस्तान से की जा सकती है।

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खुफिया एजेंसियों के सूत्र कहते हैं कि जैश ए मोहम्मद और मौलाना मसूद अजहर न सिर्फ आईएसआई के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं, बल्कि उनके तार अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अल कायदा और आईएस से भी जुड़े गए हैं। वैसे जैश के जन्म और परवरिश में अल कायदा की भूमिका पहले भी अहम रही है। जैश का हिंदुस्तान की सरजमीं पर इतना बड़ा और वह भी देश के सर्वाधिक सुरक्षित माने जाने वाले सुरक्षा प्रतिष्ठानों में से एक पर हमला भारत के सामने एक नई आतंकवादी चुनौती लेकर आया है। यह ऐसी चुनौती है जिसका नियंत्रण पाकिस्तान की उस सरकार के पास भी नहीं है जिसके मुखिया नवाज शरीफ है। इसलिए पठानकोट का हमला मोदी और शरीफ दोनों के लिए चुनौती है। क्योंकि शांति प्रक्रिया और दोस्ती का जो सफर इन दोनों ने शुरु किया उसके रास्ते में रुकावट यह पहला पहाड़ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक पाकिस्तान पहुंचकर न सिर्फ कूटनीति के मोर्चे पर एक बड़ा दांव खेला बल्कि देश की भीतरी राजनीति और अपने वैचारिक परिवार के बीच भी उनके इस कदम से सिहरन है। मोदी के अचानक नवाज़ शरीफ के जन्मदिन पर उनके पैतृक निवास रायविंड पहुंचकर पूरे परिवार के साथ दो घंटा बिताने, शरीफ को जन्मदिन और उनकी पोती को निकाह की मुबारकबाद देने और बुजुर्ग मां की कदमबोशी से जहां पूरी दुनिया में शिष्टाचार कूटनीति की एक नई मिसाल कायम हुई है, वहीं भारत में विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों ही बेहद दुविधाग्रस्त हैं।

प्रकट तौर पर कांग्रेस समेत प्रमुख विपक्षी दलों ने मोदी के इस कदम की आलोचना की है, वहीं सत्ताधारी भाजपा ने इसका समर्थन करते हुए इसे सराहा है। लेकिन ऑफ दि रिकार्ड बातचीत में दोनों खेमों का रुख उलट है। हमेशा भारत पाकिस्तान के बीच दोस्ती और मधुर रिश्तों व निरंतर बातचीत की दुहाई देने वाले विपक्षी नेता निजी बातचीत में इसे मोदी का कूटनीतिक मास्टर स्ट्रोक मानते हैं और कहते हैं कि सियासी मजबूरी के चलते उन्हें इसकी आलोचना करनी पड़ रही है। वहीं निजी बातचीत में भाजपा और संघ परिवार के दूसरे नेता कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर भरोसा करके वही गलती की है जो अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर तक बस यात्रा करके की थी और बदले में उन्हें कारगिल घुसपैठ का धोखा मिला था। अब पठानकोट हमले के बाद मोदी घर बाहर दोनों जगह मोदी विरोधियों के हौसले बढ़ जाएंगे।

पठानकोट हमले से पहले कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व के रुख पर सवाल उठाने वाले कांग्रेसी अब मोदी के कदम की पार्टी की आलोचना को सही मानने लगे हैं। हमले से पहले कई उदारवादी कांग्रेस नेताओं का कहना था कि दस साल तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे और पांच साल तक नरसिंह राव की सरकार रही। लेकिन वह दोनों नेता पाकिस्तान नहीं जा सके, जबकि कांग्रेस की नीति पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने और संवाद जारी रखने की पुरानी नीति है। जबकि धुर पाकिस्तान विरोध और हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले मोदी ने अचानक पाकिस्तान पहुंचकर सबको चौंका दिया। कांग्रेस के इन नेताओं की राय थी कि पार्टी को मोदी के इस कदम का विरोध करने की बजाय यह कहते हुए समर्थन व स्वागत करना चाहिए था कि आखिरकार उन्होंने कांग्रेस की नीति को ही सही माना और सिर्फ हुर्रियत को चाय पिलाने के मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर की वार्ता अचानक तोड़ने वाले मोदी अब अपनी गलती सुधार रहे हैं। लेकिन पठानकोट हमले ने कांग्रेस के भीतर इन उदारवादी नेताओं को भी चुप करा दिया और अब पूरी कांग्रेस मोदी और केंद्र की भाजपा सरकार की पाकिस्तान नीति को लेकर हमलावर है। वहीं एनडीए में शिवसेना जैसे सहयोगी फिर से अपना दबाव बढ़ाएंगे और संघ परिवार के कट्टरवादी तत्व फिर मंदिर से लेकर पाकिस्तान विरोध के अपने राग की आड़ में मुस्लिम विरोधी हिंदू ध्रुवीकरण का कार्ड खेलेंगे।

पठानकोट हमले में सेना के जवानों की शहादत आम लोगों में गुस्सा पैदा करेगी और खुदा न खास्ता अगर कहीं इस तरह की घटना दोबारा हो गई तो जन असंतोष के ज्वार में मोदी पाकिस्तान के प्रति अपना उदार रुख कहां तक कायम रख पाएंगे यह बड़ा सवाल है।

हालांकि पाकिस्तान सरकार और वहां मीडिया और नागरिक समाज ने पठानकोट हमले की कड़ी निंदा करने में देर नहीं लगाई। शरीफ सरकार के सामने भी वही चुनौती है जो मोदी के सामने है। इस हमले के बाद भारत में सरकार पर जनता और विपक्ष का दबाव पाकिस्तान के प्रति कठोर रुख अपनाने का बढ़ेगा, उसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान में भी कट्टरवादी तंजीमें अपने भारत विरोधी रवैये को तेज करके शरीफ सरकार के सामने उलझन पैदा करेंगी। ऐसे में दोनों देशों की सरकारों के साथ साथ मीडिया नागरिक समाज और विपक्षी राजनीतिक दलों को संयम और धैर्य की एक कड़ी अग्निपरीक्षा देनी होगी। सुरक्षा बल आतंकवादियों का मुकाबला पूरी ताकत और निर्ममता से करते रहें, लेकिन जनता को भी पाकिस्तान सरकार और आतंकवादियों के फर्क को देखना पड़ेगा। भारत में यह फर्क किया जा सके इसके लिए नवाज शरीफ सरकार को भी कुछ ऐसे कदम उठाने पड़ेंगे जिससे न सिर्फ उसकी साख भारत में कायम हो सके बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी देश और विपक्ष को यह समझाने में कामयाबी मिल सके कि पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार का रवैया पिछली सरकारों से अलग और दोस्ताना है। इसके लिए शरीफ सरकार सबसे पहले मुंबई हमले के गुनहगारों पर कड़ी कार्रवाई करके एक सकारात्मक संकेत दे सकती है। फिर मुंबई बम विस्फोट में वांछित दाऊद इब्राहीम को लेकर भारत पाकिस्तान के बीच चलने वाले लुकाछिपी के खेल को खत्म करके पाकिस्तान को ईमानदारी से इस मामले में दाऊद को भारत को सौंपने की दिशा में काम करना होगा। साथ ही क्योंकि अब फिर जैश ए मोहम्मद अपने नए आतंकवादी रूप में समाने आ गया है तो भारत अगर पाकिस्तान से कंधार विमान अपहरण कांड के गुनहगारों और उसके बदले में रिहा किए गए मसूद अजहर को वापस भारत भेजने की मांग करता है तो पाकिस्तान का क्या रुख होगा? अगर इन तीन मोर्चों पर शरीफ सरकार सकारात्मक कदम उठाती है तो न सिर्फ भारत की जनता में पाकिस्तान के प्रति भरोसा पैदा होगा बल्कि दुनिया में संदेश जाएगा कि भारत से रिश्ते सुधारने की शरीफ मोदी कवायद महज दिखावा नहीं है। इसलिए अब दोनों प्रधानमंत्रियों को यह अग्निपरीक्षा देनी है।

साभार अमर उजाला


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