मुझे मध्य पूर्व और अरबों की हर चीज़ पसंद थी, लेकिन इस्लाम से नफ़रत थी, लेकिन मैं जितना इस्लाम के बारे में पढ़ती गई, उनती मोहब्बत बढ़ती गई, यहां तक कि मैं मुसलमान हो गई।

 जब भी कोई मध्य पूर्व या इस्लाम के बारे में बात करता, बिन सोंचे ग़ौर से उसकी बात सुनती, जब मैं हाई स्कूल में थी तो वामी क़ैम में शामिल हुई। यह वास्तव में तीन दिन और दो रातों की एक पिकनिक है जो इस्लाम और मुसलमानों के बारे में क़रीब से जानने के लिए कोरिया के मुसलमानों द्वारा आयोजित की जाती है।

जब में आठ या नौ साल की थी तभी इराक़ का युद्ध शुरू हो गया था, तभी मैंने जाना के इनटरनेट का प्रयोग कैसे किया जाता है। और चूंकि हमारे देश के अमरीका के साथ नज़दीकी संबंध हैं इसलिए हमारे देश के अधिकतर लोग अमरीका के बारे में जानते हैं लेकिन मैं कभी भी इस देश को लेकर जिज्ञासु नहीं रही।

मैं पहली बार इराक़ के बारे में कुछ सुन रही थी, मुझ में इराक़ के बारे में और जानने की जिज्ञासा पैदा हुई, तब मैंने सुन रखा था कि उनका धर्म इस्लाम है। यही वह पहली बार था कि जब मैंने इस्लाम के बारे में सुना था, और मुझे लगता था कि इस्लाम शब्द का उच्चारण बहुत ही मीठा है और यह किसी धर्म के नाम जैसा नहीं लगता है!

इसलिए मैंने इस्लाम के बारे में इनटरनेट पर सर्च करना शुरू किया और मैने देखा कि वह लोग बहुत ही ठीले ठाले कपड़े पहनते हैं, अपने चेहरे को छिपाते हैं, और जैसा हिजाब मैंने अभी पहन रखा है वैसा हिजाब बहनते हैं, इस प्रकार मैंने इस्लाम और इराक़ के बारे में अधिक जाना।

लगभग दस साल पहले तक बहुत से लोग ऐसे थे जो इस्लाम के बारे में नकारात्मक सोंच रखते हैं और इस्लाम को बुरा समझते थे। मैं भी ऐसा ही सोचा करती थी। मेरे मन में सदैव इस्लाम के प्रति बुरे विचार चला करते थे। इस्लाम एक आतंकवाद है, इस्लाम यानी दाइश, इस्लाम और अलक़ायदा, इस्लाम और तालेबान।

यह वह चीज़ें थी जो इस्लाम का नाम सुन कर मेरे दिमाग़ में आती थीं। जब मैंने इस्लाम के बारे में बहुत अधिक पढ़ा और मध्य पूर्व में रहन वाले लोगों के अनुभवों के बारे में पढ़ा, तो मैंने इस्लाम और मुसलमानों को एक अलग शक्ल में देखा। लेकिन चूँकि मैं उस समय बहुत कम आयु की थी और किसी विदेशी भाषा को भी नहीं जानती थी, इसलिए मैंने इस्लाम के बारे में कोरियाई डाक्यूमेंट्रीज़ को तलाश करना शुरू किया।

उनमें से कुछ अरबों के बारे में थीं, कुछ मध्य पूर्व के बारे में, मुझे लगता है कि मैंने कोरियाई भाषा की सभी डाक्यूमेंट्रीज़ देख डालीं, साल बीतते गए प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के दौर बीतते गए। इस्लाम के प्रति मेरी मोहब्बत बढ़ती गई, जब भी कोई इस्लाम या मध्य पूर्व के बारे में बात करता तो मैं अपने को कंट्रोल न कर पाती और उसकी बातों को ग़ौर से सुनने लगती।

जब मैं हाइ स्कूल में थी तो वामी कैंप में सम्मिलित हुई, यह कोरिया में चर्च के कैंप की भाति है। वास्तव में यह गर्मियों में तीन दिन और दो रातों की एक पिकनिक है, जो कोरियाई मुसलमानों के माध्यम से इस्लाम और मुसलमानों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए आयोजित की जाती है। वह अब भी इसको आयोजित करते हैं, इसलिए अगर आप चाहें तो उनको कैंप में निशुल्क जा सकते हैं।

मैं उस कैंप में गई, अगरचे मैं इस्लाम, अरब और मध्य पूर्व के बारे में बहुत कुछ जानती थी, लेकिन मुझे स्वीकार करना पड़ेगा कि मैं बहुत डरी हुई और चिंतित थी, क्योंकि कोरिया में इस्लाम की बहुत ही बुरी छवि थी। लेकिन आतंकवाद का ही विषय नहीं था बल्कि वह अपराध भी थे जो कोरिया में मुसलमानों के ज़रिए अंजाम पाते थे और इसी प्रकार मुसलमान देशों जीन का निम्न स्तर भी एक विषय था। मेरे माता पिता ने मुझ से कहा कि अगर कैंप में बहुत की आजीब प्रकार के लोग दिखाई दें तो तुरंत हमको फोन करना!! इस चीज़ ने मुझे और चिंतित कर दिया।

कैंप की पूरी अवधि में मैंने कोरिया में इस्लाम मस्जिदों को देखा। जब मैंने कांफ़्रेस रूप को खोला, तौ मैंने सच में एक बहुत ही सुंदर बहन को कमरे में देखा! उस समय वह कोरिया में मुस्लिम छात्र संघ की अध्यक्ष थीं। मैंने अपने आप से कहाः…. ओह… यह क्या है?!!

मैं वही हूँ जो इस्लाम के प्रति सदैव कट्टरपंथी सोच रखती थी! यहां पर तो कोई भी अजीब नहीं है! किसी ने भी सर से पैर तक काला कपड़ा नहीं पहन रखा है! वामी कैंप बहुत ही अच्छे के साथ समाप्त हो गया, मैंने परीक्षा दी और बहुत सी चीज़ें इस्लाम के बारे में जानीं, सभी के साथ मेरा बहुत ही अच्छा समय कटा।

तब मैंने एहसास किया कि मुझे इस्लाम के बार में और जानना चाहिए। इसलिए मैंने हर सप्ताह मस्जिद सलाम नूरी में होने वाले कार्यक्रम में सम्मिलित होना शुरू कर दिया, और वहां मैने अपने प्रशिक्षक चचा अमीन से मुलाक़ात की और उनसे बहुत कुछ सीखा, यहां तक कि मैं एक कोरियन मुसलमान बन गई। मुसलमान होने से एक साल पहले तक मैंने इस्लाम के बारे में बहुत की पढ़ा था।

एक चीज़ जो हमेशा मेरी ज़बान पर रहती थी वह यह थी कि मैं कभी भी मुसलमान नहीं होंगी। मैं मुसलमान नहीं बन सकती। मैं कैसे हर दिन हिजाब पहन सकती हूँ? यहां तक की जब गर्मी के दिनों में मेरे पिता टोपी पहनने के लिए कहते थे तब भी मैं टोपी तक नहीं पहनती थी। मैं यह नहीं करूँगी।

मुझे वास्तव में मध्य पूर्व और अरबों की हर चीज़ पसंद थी, लेकिन इस्लाम से नफ़रत थी, लेकिन मैं जितना इस्लाम के बारे में पढ़ती गई, उनती मोहब्बत बढ़ती गई, यहां तक कि मैं मुसलमान हो गई। (आईयूवीएम प्रेस)


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