Saeed Naqvi ONLY FOR KOHRAAM
सईद नकवी

बँटवारे के बाद हिन्दू मुस्लिम संबंधों और कांग्रेस की भूमिका को लेकर सईद नक़वी ने काफ़ी तीखी टिप्पणियाँ की हैं। नक़वी मानते हैं कि भारत में हिन्दू राष्ट्र बहुत बढ़िया चल रहा है। सईद नक़वी की नई पुस्तक ‘बीइंग द अदर : द मुस्लिम इन इंडिया’ इस 22 जुलाई को बाज़ार में आ रही है। कोहराम से ख़ास बातचीत में सईद नक़वी ने खुलकर बात की।

पुस्तक बीइंग द अदर : द मुस्लिम इन इंडिया का बैकग्राउंड

मैं अवध का हूँ, मैं उत्तर प्रदेश नहीं कहता। मैं मलिक मुहम्मद जायसी के मज़ार के पास मुस्तुफ़ाबाद का रहने वाला हूँ। हमारा परिवार ज़मींदार सैयद है लेकिन शोषण नहीं होता था हमारे यहाँ। हम जनता से अवधी में बात करते थे, औपचारिक भाषा उर्दू थी और लिखते फ़ारसी में थे। मोहर्रम में हमारे यहाँ कश्मीरी पंडित प्राणनाथ काचर की तक़रीर होती थी । अवध के पंडित रतननाथ ‘सरशार’ ने 16 हिस्सों में उर्दू दीवान ‘फ़साना-ए-आज़ाद’ लिखा। वाजिद अली शाह राधा बनते थे, पंडित बिरजू महाराज के पड़दादा कृष्ण बनते थे। अब आप मेरी जड़ें समझ रहे होंगे। साम्प्रदायिकता तो हम समझते ही नहीं थे। हम अपने गीत और सौहर (माँ बनने वाली महिला के यश गीत) में ख़ुश थे। सौहर के एक गीत की पंक्ति सुनिए

अल्लाह मियाँ हमरे भैया को दियो नन्दलाल

(ऐ अल्लाह हमारे कृष्ण जैसा सुंदर भतीजा देना)

Saeed Naqvi ONLY FOR KOHRAAM
पुस्तक बीइंग द अदर : द मुस्लिम इन इंडिया का कवर

 हमारी तहज़ीब में अंग्रेज़ी को बुरा समझा जाता था। पंडित जवाहरलाल नेहरू मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से क़सम खाते थे कि भारत का बँटवारा नहीं होने देंगे लेकिन देश तो बँट गया। हमारे घर में हम जवाहरलाल नहीं पुकार सकते थे। हमें जनाब या क़िबला कहना होता था साथ में। हमारे पड़दादा को अंग्रेज़ों ने फाँसी की सज़ा दी थी। हमारे पिता के नाना मीर वाजिद अली और मोतीलाल नेहरू ने साथ पढ़ाई की थी। पंडित नेहरू अपने पिता के साथ कई बार मुस्तुफ़ाबाद के घर पर भोजन के लिए आ चुके थे। हमारे चाचा सैयद वसी नक़वी कांग्रेस से रायबरेली के पहले विधायक थे। नेहरूजी की बहन विजयलक्ष्मी पंडित की ढाका के नवाब के बेटे सैयद हुसैन से शादी हुई थी। इस हिन्दू मुस्लिम शादी की कहानी को गाँधीजी के दबाव में नेहरू परिवार ने दबाया जिसका मैंने किताब में ज़िक्र किया है।

बँटवारे के बाद के हालात से मजबूर

वादे के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने भूमि सुधार के नाम पर नवाबों को पैदल कर दिया। हमारे चाचा जो कभी नवाब थे, उन्हें रात को चपरासी बनना पड़ा ताकि दिन में कोई पहचान ना ले। कांग्रेस से तंग हमारे इलाक़े के मुसलमान सीधे वामपंथी हो गए जबकि उनके घरों में कभी मध्यम वर्ग तो आया ही नहीं। हमें कांग्रेस सरकार ने मश्विरा दिया कि हम पाकिस्तान चले जाएँ और उर्दू के मशहूर लेखक सज्जाद ज़हीर हमारे रिश्तेदार थे जो पाकिस्तान चले भी गए लेकिन हमारा घर नहीं गया। हमें एक बात समझ मे आई, अंग्रेज़ी पढ़नी होगी।

मुझे लखनऊ के मशहूर अंग्रेज़ी स्कूल में एडमिशन दिलवाया गया। बँटवारे के समय हिन्दुस्तान के हर शहर में दंगा हुआ, 1992 बाबरी मस्जिद को तोड़ने के दौरान दंगा हुआ लेकिन लखनऊ में दंगा नहीं हुआ। हम साम्प्रदायिक तो नहीं हैं लेकिन मानते हैं कि हमारे साथ दग़ा हुआ। इतने विरोधाभास के बीच सैकूलर चेहरे के तौर पर सिर्फ़ पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम ही उछाला गया। अंग्रेज़ों के ज़माने में हिन्दू के साथ मुसलमान भी प्रशासनिक सेवा में थे। बँटवारे के बाद कांग्रेस ने भारत को हिन्दू सत्ता में बदल दिया। ईमानदारी से कांग्रेस ने भारत की स्टीयरिंग व्हील को हिन्दूवाद की तरफ़ मोड़ दिया। मेरी पुस्तकों में इन्हीं तीखी बातों का ज़िक्र है। हैदराबाद में पुलिस एक्शन में हज़ारों लोगों का नरसंहार हुआ और पंडित सुन्दरलाल की रिपोर्ट में बहुत घटाकर 40 हज़ार लोगों की मौत का ज़िक्र किया। कांग्रेस तो सेकूलर थी और फिर भी यह नरसंहार कैसे हुए। स्वामीनाथन अय्यर ने हाल ही में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में सांस्कृतिक नरसंहार का जिक्र किया है। एक घाटी में कश्मीरी पंडित का और जम्मू में दो लाख 37 हज़ार मुसलमानों को मार डाला गया। बतौर मुसलमान मुझे कोई दिक़्क़त नहीं हुई इस देश में लेकिन आम मुसलमान को इस देश में बहुत परेशानी है। आप देखिए हाल ही में मुसलमानों को गाय के गोश्त के नाम पर गोबर खिला दिया गया। आम हिन्दुस्तानी बहुत अच्छा इंसान है जिससे यह देश बचा हुआ है। यह कहानी आप मेरे गाँव में सुना दीजिए, आम हिन्दू दो दिन खाना नहीं खाएगा। मुसलमान के नाम पर नफ़रत के माहौल से हिन्दू सवर्ण समाज को बहुत फ़ायदा है। जाति व्यवस्था भी बने रहे और सवर्ण लाभ कमाता रहे।

दिल्ली से कौन चिढ़ता है

हर विदेश सेवा अधिकारी चाहता है कि उसे फ्रांस में राजदूत के रूप में नियुक्ति मिले क्योंकि सरकारी मकान से एफ़िल टॉवर दिखता है। लंदन में बिंग बैंग है। ये दोनों इमारतें डेढ़ सौ साल पुरानी हैं। जबकि आपकी दिल्ली में महरौली में क़ुतुब मीनार 822 साल पुरानी है। इसे और लाल क़िले को भारत ने इसे अँधेरे में रखे हुए हैं और हमने क्षेत्र का विकास भी नहीं किया। चीन में पाँच हैरिटेज सिटी हैं और दिल्ली के सातों शहर मुसलमान सल्तनत के हैं। इसी नाम से इन्हें विकसित नहीं किया जा रहा। शाहजहाजनाबाद और लटियंस ज़ोन पर बात फ़ाइनल हुई लेकिन सिर्फ़ एक मुस्लिम सल्तनत शाहजहानाबाद की फ़ाइल ग़ायब हो गई। यह सब कांग्रेस के राज में हुआ। गोबर खिला देना बहुत छोटी बात है। औरंगज़ेब रोड का नाम बदलना इसी मानसिकता का विस्तार है।

यह किताब क्यों लिखी गई

1947 के बँटवारे के बाद भारत एक त्रिकोण में फँसा हुआ है। श्रीनगर- नई दिल्ली, भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुस्लिम। यह हर त्रिकोण पर समान रूप से वितरित है। भारत में हिन्दू राज अच्छा चल रहा है। आपको अगर इस त्रिकोण में फँसे रहना है तो आपकी मर्ज़ी है। मुस्लिम बस्ती में चले जाइए हमेशा आपको गंदगी और टूट फूट मिलेगी। आप 20 करोड़ मुसलमानों का क्या करेंगे जो हिन्दुस्तान के हर हिस्से में है। यह क्षेत्र और भाषा पर बँटा हुआ है। सड़क मार्ग से आप स्पेन से जिब्रालटर या बेलफ़ास्ट से डबलिन जा सकते हैं। इसी तरह साइप्रस, तुर्की से यूनान जा सकते हैं। हम भारत में गाड़ियाँ बेचे चले जा रहे हो लेकिन हम नहीं चाहते हमारा युवा गाड़ी दौड़ाते हुए दुनिया से जा मिले। क्योंकि आप उसका मनोविज्ञान क़ाबू में रखना चाहते हैं। उसे खुलने दीजिए।

वाजपेयी भारत पाकिस्तान बँटवारे के पक्ष में

बस से पाकिस्तान जाते हुए मुझसे बातचीत में वाजपेयी ने मज़ाक़ में कहाकि बँटवारे से हमें फ़ायदा मिला। वाजपेयी कहते थे कि अब हमें कम मुसलमान मैनेज करने पड़ते हैं। अविभाजित भारत में मुसलमान 30% थे। मैंने उन्हें त्रिकोण समझाया था और वाजपेयी बहुत सुलझे हुए नेता थे। मेरी नज़र में वह मुसलमानों के प्रति नफ़रत नहीं रखते थे। हो सकता है मैं वाजपेयीजी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त हूँ लेकिन मेरा मानना है पीवी नरसिम्हा राव ने बहुत नुक़सान पहुँचाया। सन् 1965 की जंग में शास्त्री ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता गोलवलकर को फोन कर स्वयंसेवक की मदद माँगी। यह कांग्रेस के हिन्दूवाद के संबंध को स्पष्ट करता है। नरेन्द्र मोदी पहले प्रधानमंत्री है जिन्हें बुश प्रायोजित ग्लोबल टेररिज़्म की बहस का फ़ायदा मिला है। मनमोहन सिंह अमेरिका के बड़े पिट्ठू थे मगर इस बहस का असली फ़ायदा मोदी को मिला। जब यह मुख्यमंत्री थे अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में हमले कर रहा था, उसी काल में गुजरात दंगों का मसला दब गया। रेड्डी कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 1969 में 532 मुसलमानों के नरसंहार के बाद बादशाह ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान लोगों से मिलने गुजरात गए थे। गुजरात में बादशाह ख़ान का मैं प्रेस ऑफ़ीसर था। मैंने ख़ुद सुना मुसलमान के दो स्थान, क़ब्रिस्तान या पाकिस्तान बॉम्बे के दंगों में महान् कवि अली सरदार जाफ़री को अपने नाम की तख़्ती को उखाड़ना पड़ा ताकि कोई घर पर हमला ना कर दे। उस समय कांग्रेस के मुख्यमंत्री सुधाकर नायक थे। मैं कोई फ़र्क़ नहीं देखता कि कांग्रेस या हिन्दूवादियों में कोई अंतर है।

कहाँ से लें बीइंग द अदर : द मुस्लिम इन इंडिया’?

आप ऑनलाइन अमेज़न से ले सकते हैं। दिल्ली में मिडलैंड, ख़ान मार्केट में बाहरीज़ औऱ ओरबिन्दो प्लेस से ख़रीदी जा सकती है।

 


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