महमूदाबाद के रहने वाले पूर्व विधायक मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान के पिता 1957 में पाकिस्तान चले गए थे लेकिन इन्होंने भारत में ही रुकने का फैसला किया. क्या ऐसा कर के वे “देश” के शत्रु हो गए? क्या भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मरहूम मंसूर अली खान पटौदी, उनकी पत्नी शर्मिला टैगोर और उनके बच्चे सैफ, सोहा और सबा को भारत का “शत्रु” समझा जाए? सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन एनडीए सरकार का पेश किया गया एक नया विधेयक यदि कानून की शक्ल ले लेता है, तो ये सवाल आने वाले समय में बेशक उठेंगे. वह भी उस वक्त जब देश राष्ट्रवाद, राजद्रोह और सेकुलर भारत में अल्पसंख्यकों को मिले अधिकारों पर एक भीषण बहस में उलझा पड़ा है.
विभाजन के करीब 70 साल और पाकिस्तान के साथ जंग को 50 साल से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद सरकार उस कानून को दोबारा लागू करने की कोशिश में है जो एक साथ दो ज्वलंत मसलों से निपटने की मंशा रखता है&“शत्रु” और “संपत्ति”. इस दिशा में बीती 7 जनवरी को एक अध्यादेश लाया गया था जिसे शत्रु संपत्ति (संशोधन और मान्यकरण) विधेयक 2016 में परिवर्तित किया गया और 9 मार्च को लोकसभा ने इसे पारित कर दिया है, बावजूद इसके कि कांग्रेस, बीजेडी, टीएमसी, टीआरएस, एआइएमआइएम और आरएसपी के नेताओं ने इस पर विरोध दर्ज करवाया था. इसका लक्ष्य उस संपत्ति को राजसात करना है जो कभी पाकिस्तानी नागरिक की थी, भले ही उक्त व्यक्ति के कानूनी उत्तराधिकारी भारतीय हैं. यह विधेयक मूल शत्रु संपत्ति विधेयक, 1968 को पिछली तारीख से संशोधित करता है और 2005 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को भी खारिज करता है जिसमें कहा गया था कि ऐसी संपत्तियों को राजसात करने की प्रक्रिया में भारतीय नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए. 15 मार्च को राज्यसभा ने यह विधेयक समीक्षा के लिए प्रवर समिति के पास भेजने की मांग की है.

कुछ जानकारों का मानना है कि यह विधेयक समानता के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है क्योंकि यह दो किस्म के भारतीयों के बीच फर्क करता है&एक जिनके पुरखे पाकिस्तान चले गए थे और दूसरे जो नहीं गए. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में कहा था, “यह लाखों भारतीय नागरिकों के अधिकारों पर असर डालेगा. साफ  शब्दों में कहें तो सीधे मुसलमान समुदाय को प्रभावित करेगा. यह उनकी संपत्ति है जो पाकिस्तान चले गए थे और यह एक ही समुदाय का मामला है और मेरे हिसाब से यह न केवल असंवैधानिक है&यह अदालत को तय करना चाहिए&बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के भी खिलाफ  है.” यूपीए सरकार ने ऐसा ही एक विधेयक 2010 में तैयार किया था लेकिन उसके नेताओं, खासकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विवाद के मद्देनजर बिल को अपनी मौत मर जाने दिया.

पिछली गणना के हिसाब से सरकार ने 19 राज्यों में 15,143 “शत्रु संपत्तियां” पहचानी हैं जिनमें महल, हवेलियां, मकान समेत वाणिज्यिक इमारतें और खेती की जमीनें शामिल हैं. ऐसी संपत्तियों की संख्या 2011 में बमुश्किल 2,111 थी जो नाटकीय ढंग से बढ़ गईं. इनमें से एक लाख करोड़ रु. की अनुमानित लागत वाली 9,400 संपत्तियों को राजसात करने और भारत में शत्रु संपत्तियों के कस्टोडियन के जिक्वमे सौंपने की प्रक्रिया पहले ही पूरी की जा चुकी है. विधेयक 1968 से ही “शत्रु संपत्ति” की उसके उत्तराधिकारी द्वारा बिक्री या हस्तांतरण को खारिज करता है. इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिन्हें यह पता ही नहीं है कि उनके पास जो संपत्ति है वह कभी “शत्रु” की थी. नए प्रावधानों के अनुसार इन संपत्तियों को भारत सरकार अपने कब्जे में लेकर किसी तीसरे को बेच सकती है और उसे रोकने का कोई कानूनी रास्ता मौजूद नहीं है. सरकार की दलील है कि इन संपत्तियों के रखरखाव और मुकदमेबाजी आदि की प्रक्रिया से निपटने में उसे दिक्कत आ रही है. सरकार कहती है कि चूंकि इन संपत्तियों का कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो वह इन्हें बेचकर आए पैसे को कंसॉलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया में स्थानांतरित कर सकती है चूंकि पाकिस्तान पहले ही अपने यहां मौजूद भारतीय नागरिकों की संपत्तियों को बेच चुका है.

पाकिस्तान ने यह प्रक्रिया 1971 में ही पूरी कर ली थी, हालांकि भारत के इस कदम को भारत के विचार के खिलाफ  करार दिया जा रहा है और विधेयक को “प्रतिशोध की कार्रवाई” कहा जा रहा है. “शत्रु संपत्ति” से जुड़े मामलों के जानकार और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता नीरज गुप्ता कहते हैं, “दूसरे देश में जो हुआ उसका हमारे लिए कोई मतलब नहीं होना चाहिए. हमारे पास अपने कानून हैं. जिन लोगों के पुरखे पाकिस्तान चले गए लेकिन उन्होंने भारत में ही रुकना स्वीकार किया, क्या इसका कोई अर्थ नहीं है? “शत्रु” को दंडित करने की बजाए आप अपनों को ही तो सजा नहीं दे रहे?” दूसरे शब्दों में अगर पलायन को अपराध मान लिया जाए, तब भी पिता के पापों के लिए आप बेटों को सजा कैसे दे सकते हैं?

शत्रु संपत्ति कानूनक्या चुनाव की अहमियत है?
इस मसले को बेहतर तरीके से समझने के लिए हम उत्तर प्रदेश में लखनऊ, सीतापुर और नैनीताल में मौजूद महमूदाबाद की संपत्तियों की मिसाल ले सकते हैं. दिसंबर 1957 में महमूदाबाद के तत्कालीन राजा मोहम्मद आमिर अहमद खान ने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली थी. उनकी पत्नी रानी कनीज आबिद और बेटे मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान ने वहां न जाने का फैसला किया. यह बात 1962 में चीन की जंग के दौरान “शत्रु संपत्ति” की अवधारणा लाए जाने से पांच साल पहले की है, जब भारत में चीनी नागरिकों की संपत्तियों को अस्थायी रूप से एक कस्टोडियन के हवाले कर दिया गया था ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि उनका इस्तेमाल राज्य के खिलाफ  नहीं होगा. जब 1965 की जंग छिड़ी, तो तीन साल पुराने आदेश के प्रावधानों को पाकिस्तान तक विस्तारित कर दिया गया और नतीजतन महमूदाबाद की संपत्ति को केंद्र सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया. राजा की 1973 में लंदन में मौत हो गई. उनके बेटे तब कैंब्रिज में ऐस्ट्रोफिजिक्स की पढ़ाई कर रहे थे. वे भारत लौटे और याचिका दायर की कि सरकार उनके पिता की संपत्ति वापस करे क्योंकि वे अपने पिता के कानूनी उत्तराधिकारी और भारतीय नागरिक हैं.

कांग्रेस से 1985 और 1989 में दो बार विधायक रह चुके मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान अगले 24 साल तक सरकार से अपनी संपत्ति छोडऩे की गुहार लगाते रहे लेकिन कोई हल नहीं निकला. आखिरकार उन्होंने बंबई हाइकोर्ट में 1997 में एक रिट याचिका दायर की क्योंकि शत्रु संपत्तियों के कस्टोडियन का दफ्तर मुंबई में है. 2001 में वे मुकदमा जीत गए, जिसके बाद एनडीए सरकार ने हाइकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन आमिर ने 2005 में फिर से मुकदमा जीत लिया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार 1973 से उनकी संपत्ति पर अवैध कब्जा किए हुए थी. इन संपत्तियों में सबसे महत्वपूर्ण हैं लखनऊ के बाहरी इलाके में स्थित महमूदाबाद का किला, लखनऊ का बटलर पैलेस, सीतापुर में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का आवास और नैनीताल का होटल मेट्रोपोल&इन्हें उनको दे दिया गया. लखनऊ के हजरतगंज की कुछ और संपत्तियों को प्रतीकात्मक रूप से ही छोड़ा गया हालांकि किराएदारी से जुड़े कुछ विवादों के चलते उनका कब्जा आमिर को नहीं मिल सका.

यह सारी व्यवस्था हालांकि 2010 में अचानक गड़बड़ा गई जब यूपीए सरकार ने एक अध्यादेश लाकर 1968 के मूल शत्रु संपत्ति कानून को पिछली तारीख से दोबारा लिखने की कोशिश की. कस्टोडियन के एजेंट एक बार फिर महमूदाबाद की संपत्ति को कब्जाने में लग गए और अध्यादेश लंबित हो जाने के बाद भी परिवार को ये संपत्ति वापिस नहीं की. आमिर एक बार फिर अदालत पहुंचे. पहले दिल्ली हाइकोर्ट और फिर उत्तराखंड हाइकोर्ट, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट भेजा गया. इस मामले में 7 जनवरी, 2016 को सुनवाई होनी थी लेकिन ऐन उसी दिन एनडीए सरकार ने कानून को पिछली तारीख से संशोधित तथा मान्य कराने के लिए एक अध्यादेश जारी कर दिया.

72 वर्षीय मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान कहते हैं, “मुझे तकलीफ इस बात से नहीं है कि मेरी संपत्ति दांव पर लगी है बल्कि इस मामले से जो व्यापक संदेश जा रहा है, वह चिंताजनक है. क्या मैं इसलिए यह सब झेल रहा हूं क्योंकि मैं ऐसे शख्स का बेटा हूं जिसने एक मौके पर पाकिस्तान का समर्थन किया था लेकिन बाद में पूरी तरह बदल गया? क्या मैं इसलिए अभिशप्त हूं क्योंकि मैं मुसलमान हूं या कि मैं एक सामंती परिवार में पैदा हुआ?” वे कहते हैं, “बेशक मैं अपने जन्म से वह सब कुछ हूं, लेकिन मैंने भारतीय नागरिक होना चुना है इसलिए किसी भी दूसरे भारतीय की तरह संविधान और कानून की निगाह में बराबर हूं. नया विधेयक लाखों भारतीयों पर असर डालेगा, भ्रष्टाचार के रास्ते खोलेगा और सुप्रीम कोर्ट समेत सभी न्यायिक संस्थानों का मखौल बनाकर रख देगा.”

महमूदाबाद की जायदाद तो सिर्फ  एक मिसाल है. सरकार की मंशा इस अध्यादेश के आने से साल भर पहले ही साफ  हो गई थी जब 19 दिसंबर 2014 को कस्टोडियन ने 1968 के कानून की धारा 11 के तहत सैफ अली खान को नोटिस जारी करके पूछा था कि उन्हें विरासत में मिली भोपाल एस्टेट की जायदाद को क्यों न “शत्रु संपत्ति” माना जाए? इसके बाद फरवरी 2015 में कस्टोडियन ने इसे “शत्रु संपत्ति” घोषित भी कर दिया, इस आधार पर कि भोपाल के तत्कालीन नवाब हमीदुल्ला खान की सबसे बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान&प्रतिष्ठित राजनयिक और क्रिकेट प्रशासक शहरयार खान की मां&1950 में पाकिस्तान चली गई थीं. ऐसा इसके बावजूद कि आबिदा सुल्तान ने अपनी विरासत और जायदाद से खुद को अलग कर लिया था जो उनकी बहन साजिदा सुल्तान को उत्तराधिकार में मिली. वे मंसूर अली खान पटौदी की मां और इकलौती वारिस थीं. इस विरासत के हस्तांतरण को 1961 में भारत के राष्ट्रपति से आधिकारिक मान्यता प्राप्त थी.

शत्रु संपत्ति पर मोदी सरकार का रवैया

भोपाल की संपत्ति कस्टोडियन द्वारा कब्जाए जाने के खिलाफ  सैफ  कोर्ट से रोक लगवा चुके हैं. सैफ  के वकील राजेश पंचोली कहते हैं, “नए बिल के बावजूद संपत्ति को शत्रु संपत्ति करार नहीं दिया जा सकता. जब भारत के राष्ट्रपति ने साजिदा सुल्तान को मिली विरासत पर मुहर लगाई है, तो कस्टोडियन कैसे नोटिस या उसका उल्लंघन करने वाला आदेश जारी कर सकता है?” भोपाल में 5,000 परिवारों का एक और समूह है जो इस बिल से प्रभावित हो सकता है. इस समूह ने घर बचाओ संघर्ष समिति गठित की है और इनके वकील जगदीश छावनी हैं, जिनका कहना है कि इस मामले में 10,000 एकड़ से ज्यादा जमीन शामिल है. उनके कुछ मुवक्किलों ने बीते पांच दशकों के दौरान जायदाद खरीदी है जिस पर खतरा पैदा हो गया है क्योंकि नया विधेयक “शत्रु संपत्ति” की पिछली सारी खरीद-फरोख्त को खारिज करता है.

इसे इस तरह से समझें कि आपने अगर बेचने वाले के स्वामित्व का परीक्षण करने के बाद संपत्ति खरीदी हो और तमाम खरीद-फरोख्त के सिलसिले को जांचने के बाद आप इस निष्कर्ष पर पहुंचे हों कि इसे “शत्रु संपत्ति” माने जाने की कोई वजह नहीं है, तब भी अगर किसी मोड़ पर यह संपत्ति किसी ऐसे शख्स के पास रही हो जो पाकिस्तानी था या हो गया, तो आपसे वह संपत्ति छीनी जा सकती है. बीजेडी के सांसद पिनाकी मिश्र ने लोकसभा में सवाल उठाया था, “पचास साल में सैकड़ों बार खरीद-फरोख्त हुई होगी. आप इन सबको खारिज भी कर देंगे और किसी के लिए कोई कानूनी रास्ता भी नहीं छोड़ेंगे? क्या यह संसद ऐसा वाहियात कानून बना सकती है? यह तो अनुच्छेद 226 के तहत तुरंत एक याचिका दायर किए जाने का न्योता है और पहले ही दिन इस पर रोक लग जाएगी!”

कुछ दूसरी अहम जायदादों में गौतमबुद्ध नगर के शाहबेरी गांव की एक जमीन है जिसे 1968 में बेचा गया था लेकिन अब उसे कस्टोडियन ने ले लिया है. एक संपत्ति हैदराबाद के रंगारेड्डी जिले में है जिसे कस्टोडियन ने कब्जा लिया है, बावजूद इसके कि उसके चार मालिकों में से केवल एक ही पाकिस्तान गया था.

स्थायी शत्रु?
विधेयक को संसद में रखे जाते वक्त केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इन आरोपों को हलका करने की कोशिश की कि यह विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है और कहा कि बिल चीनी नागरिकों की संपत्ति पर भी लागू होगा.

सवाल है कि क्या स्थायी दुश्मन जैसी कोई चीज होती है? आज राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक ढांचे के भीतर साझीदार और प्रतिद्वंद्वी होते हैं, गठजोड़ बनते हैं और मनमुटाव होते हैं, लेकिन इनकी परिभाषा समय के साथ बदलती रहती है. ब्रिटेन और जर्मनी जंग के दौरान दुश्मन रहे लेकिन आज मोर्चों पर साझीदार हैं. भारत और पाकिस्तान की पैदाइश भले ही 1947 में जुड़वां गणतंत्रों के रूप में हुई और तब से सीमा पर आतंकवाद कायम है, इसके बावजूद हमारा रिश्ता कोई खास अलग नहीं है. हमारे प्रधानमंत्री व्यापार, खेल और प्रशासनिक बहाली के लिए संवाद करते हैं. इस विधेयक की स्थायी प्रकृति हालांकि यह मानकर चलती है कि दो देश हमारे दुश्मन थे और रहेंगे. अगर भारत किसी तीसरे देश के साथ जंग में उलझ जाए या फिर ऐसी परिस्थिति में पड़ जाए जहां उसे किसी और देश को अपना दुश्मन मानना पड़े, तब क्या उस देश के लोगों की संपत्तियां भी जब्त की जाएंगी?

सत्ताधारी बीजेपी ने लोकसभा में एक कदम और आगे बढ़ा दिया जब राजस्थान से उसके सांसद पी.पी. चौधरी ने कहा कि विधेयक में राजद्रोह के मामले के दोषी लोगों की संपत्तियों को भी जोड़ा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, “राजद्रोह के दोषी व्यक्ति को भी “शत्रु” माना जाना चाहिए और उसकी संपत्ति को इस विधेयक के प्रावधानों के दायरे में लाया जाना चाहिए.”

तो शत्रु संपत्ति विधेयक इस सरकार के हाथों का एक ऐसा औजार होगा जिसके सहारे वह किसी भी व्यक्ति के खिलाफ  कार्रवाई कर सकेगी जिसे वह राजद्रोह में लिप्त मानती है? सरकार को इन सवालों का जवाब देना होगा, संसद में या अदालत में. कौन दुश्मन है, कौन नहीं, यह आने वाले दिनों की एक झलक भर है. (aajtak)


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