गोरक्षा के नाम पर हो रही है हिंसा. क्या कहेंगे आप? बीबीसी हिंदी पर इस मुद्दे पर हुई ‘कहासुनी’ में बड़ी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया और अपनी बात रखी.

कुछ लोगों ने इसे राज्य सरकार की नाकामी बताया तो दूसरे कुछ लोग इसे देश में बढ़ती असहिष्णुता मानते हैं. इसके साथ ही कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने कहा कि इस पूरे मामले को बेवजह तूल दिया गया है.

मोहम्मद तारिक़ ने सवाल उठाया कि इसे चरमपंथ क्यों नही कहना चाहिए? उनका कहना है कि बाबरी, दादरी और अब लातेहार की वारदात चरमपंथी घटनाएं ही हैं और ये मुसलमानों और दलितों के ख़िलाफ़ हैं.

संजय शाह ने पूछा है, “हमारा भारत किस ओर जा रहा है? पंद्रह साल के बच्चे को मारकर ये लोग क्या कहना चाहते हैं? क्या उसे पेड़ से लटकाना गोमाता के प्रति प्रेम दिखाना है? वे लिखते हैं, उस बच्चे को शायद धर्म और मज़हब का अर्थ भी न पता हो. वह तो शायद इंसान को इंसान समझ रहा हो.”

सतीश कुमार चंद्र ने लिखा, “गोरक्षा के नाम पर अगर इसी तरह हिंसा जारी रही तो शायद आने वाले वक्त में भारत इंसान विहीन और सिर्फ गाय वाला देश बनकर ही रह जाएगा.”

प्रेमदयाल गुप्ता ने इसे भाजपा का जंगल राज क़रार दिया.

दीपक विद्रोही ने लिखा, “भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है, लेकिन अब यहां लोकतंत्र खतरे में है. दुनिया को इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है. अब आरएसएस यह तय करता है लोग क्या खाएं या क्या नहीं खाएं? यहां तक की देश भक्ति की सारी परिभाषाएं भी आरएसएस ही तय कर रहा है.”

सतीश शर्मा इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. लेकिन वे कई सवाल भी उठाते हैं.

वे लिखते हैं, “सोचने वाली बात यह है कि जब भी देश में कहीं चुनाव आते हैं, कोई न कोई घटना सामने आ जाती है. बिना तथ्य के आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि यह निंदनीय वारदात किसी हिंदूवादी संगठन ने की है. जानबूझकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है ताकि मुस्लिम समुदाय के लोगों में बीजेपी और आरएसएस का डर पैदा हो सके. इस घटना के पीछे और कोई वजह हो सकती है.”

पराग पारित का आरोप है कि भारत का मीडिया बिका हुआ है और इस तरह की ख़बरों के लिए उसे दुबई से पैसे मिलते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू मारे जाते हैं तो यह मीडिया उसकी रिपोर्ट नहीं देता. कई लोगों ने इस तरह के कमेंट्स लिखे हैं और गाली गलौच तक की है. (BBC)


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