रांची : अब्दुर्रज्जाक अंसारी मेमोरियल वीवर्स अस्पताल (अब मेदांता अस्पताल), इरबा राजधानी से 20 किलोमीटर दूर है. 20 वर्ष पहले ओरमांझी प्रखंड के इस गांव ने अपनी अलग पहचान बना ली है.

क्षेत्र के विकास में अब्दुर्रज्जाक अंसारी का अमूल्य योगदान है. 24 जनवरी 1917 को इरबा के असद अली के घर में उनका जन्म हुआ था. अब्दुर्रज़्जाक के सपने को 1996 में अब्दुर्रजाक अंसारी मेमोरियल वीवर्स अस्पताल की स्थापना कर पूरी की गयी. यह अस्पताल न केवल बीमारों का इलाज कर रहा है, बल्कि इस पूरे क्षेत्र में बेरोजगारी दूर कर रहा है.

इरबा गांव के एक कच्चे छप्पर में रहनेवाले असद अली पेशे से बुनकर थे. कड़ी मशक्कत से धागा बुनकर कपड़े तैयार करनेवाले इस परिवार में मुश्किल से चूल्हा जलता था. पिता असद अली ने काफी सोच-समझ कर अपने बेटे का नाम अब्दुर्रजाक रखा, क्योंकि इसका मतलब रज्जाक का बंदा होता है.

अब्दुर्रजाक ने माता–पिता से कुछ कहे बिना ही हथकरघा थाम लिया. 12 साल की उम्र में ही वह बुनकर कला में माहिर हो गए. इरबा से रांची पैदल आकर कपड़ों की फेरी लगाने के अलावा वे पढ़ाई करने लगे. प्राथमिक शिक्षा के बाद इरबा से काफी दूर एक मिडिल स्कूल में प्रवेश लिया. अब्दुर्रज्ज़ाक ने मिडिल स्कूल में प्रथम स्थान हासिल किया. बाद में शादी होने पर उन्होंने पत्नी के साथ मिल कर क्षेत्र की लड़कियों को शिक्षा देने का काम शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने क्षेत्र में 17 स्कूलों की स्थापना की.

इनमें से एक ओरमांझी हाई स्कूल भी था. भुखमरी दूर करने के लिए उन्होंने लगभग 40 बुनकर सहकारी समितियों के माध्यम से बुनकरों और आदिवासी महिलाओं के लिए रोजगार उपलब्ध कराया. आदिवासी महिलाओं को साल के पत्तों की थाली व कटोरा बनाने का काम दिया. वह इरबा में इस अस्पताल का शिलान्यास करने के लिए राज्यपाल से मिलने पटना गए थे, दुर्भाग्य से इरबा लौटते समय उन्हें दिल का गंभीर दौरा पड़ा और उनकी मौत हाे गयी.

बुनकर यूनियन ने यह तय किया कि अब्दुर्रज़ाक अंसारी वीवर्स हास्पिटल की स्थापना की जाये. उनके बड़े पुत्र सईद अहमद अंसारी व मंजूर अहमद अंसारी ने इस काम को सुनिश्चित कराया. सात अप्रैल 1996 को अपोलो के साथ  मिल कर हॉस्पिटल की नींव डाली. साभार: prabhatkhabar


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