देश में जहां दलितों व पिछड़ों के ख़िलाफ़ अपराध में इज़ाफ़ा हुआ है, वहीं भारत के जेलों में भी इनकी संख्या काफी अधिक है. नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ें बताते हैं कि जेल की कुल आबादी का 64 फीसदी आबादी एसटी, एससी व ओबीसी हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2014 में भारत विभिन्न जेलों में कुल सज़ायाफ़्ता क़ैदियों की संख्या 131517 है, उनमें से 33.4 फीसदी ओबीसी, 21.3 फीसदी एससी और 11.9 फीसदी एसटी क़ैदी हैं. यानी कुल 66.6 फीसद क़ैदी एसटी, एससी व ओबीसी समुदाय से हैं.

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यदि अंडरट्रायल क़ैदियों की बात करें तो एनसीआरबी के आंकड़ें बताते हैं कि भारत के विभिन्न जेलों में साल 2014 में कुल 282879 क़ैदी विचाराधीन हैं. इनमें से 31.3 फीसदी ओबीसी, 20.2 फीसदी एससी और 11.2 फीसदी एसटी क़ैदी हैं. यानी कुल 62.7 फीसद क़ैदी एसटी, एससी व ओबीसी समुदाय से हैं.

वहीं अगर डिटेन किए गए क़ैदियों की बात की जाए तो भारत के विभिन्न जेलों में साल 2014 में कुल 3237 क़ैदी डिटेन किए गए हैं. उनमें से 38.1 फीसदी ओबीसी, 18.8 फीसदी एससी और 5.1 फीसदी एसटी क़ैदी हैं. यानी कुल 62 फीसद क़ैदी एसटी, एससी व ओबीसी समुदाय से हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं कि –‘ये जातियां हिन्दुस्तान में पिछड़ी व गरीब हैं. इनके साथ सरकारें सामाजिक व आर्थिक न्याय नहीं कर रही हैं. ये ही सबसे अधिक अन्याय के शिकार हैं. जो अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं, वही जेलों में हैं.’

अब अगर बात इनके साथ होने वाले अपराधों की करें तो एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक साल 2014 में दलितों के ख़िलाफ़ 47064 अपराध हुए. यानी औसतन हर घंटे दलितों के ख़िलाफ़ पांच से ज़्यादा (5.3) के साथ अपराध हुए हैं.

आंकड़े बताते हैं कि साल 2014 में 744 दलितों के हत्या के मामले दर्ज हुए हैं, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 676 था. वहीं 2252 मामले बलात्कार के संबंध में दर्ज हुए हैं, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 2073 था. इसके अलावा 101 मामले दलितों के मानवाधिकार उल्लंघन के संबंध में दर्ज हुए हैं, जबकि 2013 में यह आंकड़ा सिर्फ 62 था. यानी साल 2014 में दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में इसके पिछले साल के मुक़ाबले 19 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ है.

ऐसे में यदि अपराधों की गंभीरता को देखें तो इस दौरान हर दिन 2 दलितों की हत्या हुई और हर दिन औसतन 6 दलित महिलाएं (6.17) बलात्कार की शिकार हुईं हैं. देश में अल्पसंख्यकों का हाल भी कुछ ऐसा ही है. आंकड़े बताते हैं कि इनके ऊपर भी होने वाले अत्याचार में इज़ाफ़ा हुआ है.

नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ें कहते हैं कि 2013 में देश के कुल कैदियों में 28.5 फीसदी अल्पसंख्यक क़ैदी थे, वहीं 2014 में 34.65 फीसदी अल्पसंख्यक कैदी जेलों में बंद हैं. जबकि देश की आबादी में इनकी हिस्सेदारी मात्र 18.25 फीसद है.

जेलों में बंद धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात की जाए तो 2014 के अंत तक 26.4 फीसदी मुसलमान जेलों में बंद हैं. जबकि 2011 के जनगणना के अनुसार देश की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 14.23 फीसदी है.

यही कहानी दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ भी है. सिक्ख समुदाय के 3.06 फीसदी लोग जेलों में बंद हैं, जबकि आबादी के लिहाज़ से इनकी जनसंख्या देश में मात्र 1.72 फीसद है. ईसाई समुदाय के 5.95 फीसद लोग जेलों में बंद हैं, जबकि हिन्दुस्तान की आबादी में उनका योगदान 2.3 फीसदी है.

आंकड़े यह भी बताते हैं कि 16.4 फीसदी मुसलमान, 5.5 फीसदी सिक्ख और 3.9 फीसदी ईसाई कैदियों पर ही आरोप तय हो पाया है. बाकी 21.1 फीसदी मुसलमान, 3.6 फीसदी सिक्ख और 3.9 फीसदी ईसाई कैदी फिलहाल अंडर ट्रायल हैं. वहीं 20.3 फीसदी मुसलमान व 15.6 फीसदी ईसाईयों को डिटेंन किया गया है.

मानवाधिकार कार्यकर्ता मनीषा सेठी कहती हैं कि –‘देश का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम ही गरीबों व अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ है. पुलिस व जांच एजेंसियां निष्पक्ष नहीं हैं. आप देखेंगे कि मुसलमान 20-20 साल जेलों में रह रहे हैं और उसके बाद अदालत उन्हें निर्दोष बताती है. हम सबको इस पर ज़रूर सोचना चाहिए.’

स्पष्ट रहे कि एनसीआरबी ने साल 2015 के आंकड़े अभी जारी नहीं किए हैं और इस साल के जून-जुलाई तक इन आंकड़ों के आने की उम्मीद है. साभार: Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net


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