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  • पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही हैं. इसके लिए उन्होंने अल्पसंख्यक वोटों पर हद से ज्यादा भरोसा दिखाया है.
  • मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता ने अल्पसंख्यक समुदाय के लिए कई ऐसे राजनीतिक फैसले लिए हैं जिनसे समुदाय की स्थिति में दीर्घकालिक बदलाव आने की बजाय तात्कालिक तुष्टिकरण की बू आती है. मुस्लिम बंगाल की कई विधानसभाओं में हार-जीत तय करते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुंआधार प्रचार और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ द्वारा अपनी पूरी ताकत लगा देने के बाद भी बिहार में बीजेपी को करारी हार मिली है. इससे उत्साहित ममता बनर्जी को पूरी उम्मीद है कि कुछ ही माह बाद होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उनकी वापसी तय है.

ममता की इस उम्मीद के पीछे मुसलमानों को लेकर उनका भरोसा भी है. ममता इस बात को अच्छी तरह समझती हैं कि मोदी, संघ और भाजपा के नेता जब पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार करने उतरेंगे तो मतों का ध्रुवीकरण होना तय है. उनकी कोशिश मुसलमान वोटरों पर एकाधिकार बनाए रखने की है.

अगले साल बंगाल के अलावा असम, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी में भी चुनाव होना है. भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद असम के बाद बंगाल से है. बीजेपी बंगाल में हिंदुत्व की राजनीति के जरिए अपनी किस्मत चमकाना चाहती हैं.

कहने को तो ममता बनर्जी की पूरी राजनीति धर्म निरपेक्षता की है लेकिन हाल के दिनोंं में उन्होंने मुस्लिमों को रिझाने के लिए जिस तरह की नीतियों और योजनाओं की घोषणा की है वह बहुत व्यावहारिक नहीं कही जा सकती. उत्तर प्रदेश में जिस तरह की सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप समाजवादी पार्टी और बीजेपी पर लगता रहा है कमोबेश ममता भी बंगाल में उसी ढर्रे पर जा रही हैं. जानकार कहते हैं कि ममता की ‘अल्पंसख्यक’ केंद्रित राजनीति इस समुदाय में पिछड़ापन दूर करने की बजाए कट्टरता को बढ़ावा देगा.

कांग्रेस का हाथ, ममता के साथ!

बंगाल में कांग्रेस का कई मुस्लिम क्षेत्रों में अच्छा खासा प्रभाव है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ मिलकर ममता मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही हैं. अगर वो ऐसा करने में सफल रही तो उनकी दोबारा वापसी हो सकती है. यह रणनीति नीतीश कुमार के तर्ज की है. उन्होंने बिहार में कांग्रेस को साथ लेकर जिस तरह से महागठबंधन तैयार किया था वैसे ही ममता बंगाल में कर सकती हैं.

उन्हें मालूम है बंगाल में सत्ता बिना मुसलमानों के साथ मिले संभव नहीं है. ममता पिछले तीन महीनों में कम से कम चार मुस्लिम रैलियों को संबोधित कर चुकी है. इसमें से एक रैली का आयोजन जमीयत उलेमा ए हिंद ने किया था और दूसरी रैली फुरफुरा शरीफ के पीरजादा तोहा सिद्दिकी ने आयोजित की थी.

बंगाल में मुस्लिमों की करीब 30 फीसदी आबादी है. राज्य की कुल 294 विधानसभाओं में से तकरीबन 70 सीटों पर वे हार-जीत में भूमिका निभाते हैं. जबकि 35 अन्य विधानसभाओं में उनकी अच्छी-खासी तादात है.

ममता का मुस्लिम प्रेम

  • मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय अपने पास रखा है ताकि मुसलमानों से जुड़े मसलों पर वे खुद फैसले ले सकें और जल्द से जल्द उनका निवारण कर सकें.
  • मुख्यमंत्री बनने के सात दिन के भीतर ही उन्होंने बंगाल मदरसा यूनियन की मांग को पूरा करते हुए आलिया यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर आलिया मदरसा यूनिवर्सिटी कर दिया था.
  • अप्रैल 2012 में उन्होंने इमामों के लिए 2500 रुपए और मुअज्जिनों के लिए 1500 रुपए मासिक वेतन भत्ता देने की घोषणा की. हालांकि, कोलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया.
  • दिसंबर 2013 में विवादित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के लिखे टीवी धारावाहिक के प्रसारण पर रोक लगा दी गई.
  • जनवरी 2013 में ममता बनर्जी ने मौलवियों के विरोध के चलते विवादित लेखक सलमान रश्दी को कोलकाता आने से रोक दिया था.
  • जुलाई 2013 में पंचायत चुनावों के ठीक पहले ममता बनर्जी ने सरकारी सहायत़ा प्राप्त मदरसों में कक्षा आठवीं, नौवीं और दसवीं में पढ़ने वाली मुस्लिम लड़कियों को साइकिल देने का एलान किया था.
  • उन्होंने मुस्लिम छात्रों को एक हजार से लेकर दस हजार तक प्री मैट्रिक छात्रवृत्तियां देने के साथ ही पांच हजार किताबों वाले चल पुस्तकालय और मदरसों में अव्वल आने वाले छात्रों को लैपटॉप देने की घोषणा भी की.
  • उन्होंने 56 मुस्लिम मार्केटिंग केंद्र बनाने की घोषणा की. ममता सरकार को उम्मीद थी कि इससे लगभग 55,000 मुस्लिमों को रोजगार मिलेगा.
  • पश्चिम बंगाल के जिन क्षेत्रों में उर्दू बोलने वालों की ताादात 10 फीसदी से ज्यादा थी वहां उन्होंने उर्दू को दूसरी सरकारी भाषा बना दिया.

बंगाल की डेमोग्राफिक सच्चाई ऐसी है जिसमें ममता बनर्जी को मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने का मौका मिल जाता है. सेक्युलरिज्म के पारंपरिक विचार के साथ तृणमूल कांग्रेस द्वारा की जा रही छेड़छाड़ के नुकसान दूरगामी होंगे. सूबे में 30 फीसदी मुसलिम आबादी के लिहाज से उनकी योजनाओं को तुष्टिकरण नहीं कह सकते. सच्चर समिति की रिपोर्ट भी पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की दयनीय दशा की बात करती है.

ममता बनर्जी ने चतुराई से अल्पसंख्यकों के बीच पैठ बनाई है. ममता वही रणनीति अपना रही हैं जो बाकी जगहों पर दूसरी पार्टियां अपनाती आई हैं. मुसलमानों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा करके उसका फायदा उठाने की नीति. लेकिन इस नीति का नतीजा हम असफलता के रूप में देख चुके हैं. इसका खामियाजा मुसलमानों को ही उठाना होगा. कुछेक स्वार्थी मुस्लिम नेताओं को भले ही इससे तात्कालिक फायदा हो जाय लेकिन आने वाले समय में मुसलमानों की मूल समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकलेगा. साभार: catchnews


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