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जब से मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई हैं वहां पर सरकार का शासन कम बल्कि संघ परिवार का शासन चलता आया हैं. ऐसे में कही किसी भी अधिकारी ने संघ परिवार से जुड़े किसी भी अदना कार्यकर्ता पर भी कारवाई कर दी तो उसके नसीब में बुरे दिन आ गये. ऐसे मामलों में बालघाट ताज़ा उदाहरण हैं..

  1. मंदसौर से अलग होकर नीमच जिले में एक धर्म स्थल  को लेकर हुए सांप्रदायिक तनाव के दौरान महिला आईपीएस अफसर अमोग्ला अय्यर को संघ परिवार से जुड़े भगवा कार्यकर्ताओं पार कारवाई करना महंगा पढ़ गया. तत्काल आदेश से अय्यर का तबादला कर दिया गया. अब वे प्रतिनियुक्ति पर मध्यप्रदेश को चोधकर चली गई.
  2. दूसरा मामला आगर-मालवा जिले से जुडा हुआ हैं. जहाँ पर एक साम्प्रदायिक तनाव में तत्कालीन एसपी आरआरएस परिहार को मौर्चा संभालना भारी पड़ गया. भगवा कार्यकर्ताओं पर कारवाई से नाराज शिवराज सरकार ने तत्कालीन एएसपी महावीर मुजालदे को लूप लाइन में डाल दिया. लगातार दो सालों से वे लूप लाइन में हैं.
  3. इसी साल जुलाई  महीने में रायसेन जिले के दीवानगंज के सेमरा गांव में दो समुदाय के संघर्ष को खत्म करने के लिए पुलिस के बल प्रयोग की गाज एसपी दीपक वर्मा पर जा गिरी. संघी कार्यकर्ताओं की नाराजगी के सबब उनका तबादला कर  25वीं बटालियन में पदस्थ कर दिया गया. साथ ही उनके एसडीओपी मंजीत चावला को भी इसकी सजा भुगतनी पड़ी. उन्हें तबादला कर पुलिस मुख्यालय में भेज दिया गया.
  4. इसी तरह चर्चाओं में बना हुआ बालाघाट मामलें में संघ के कहर से आईपीएस असित यादव भी नहीं बच पाए. यादव के साथ उनकी पूरी टीम को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होना पढ़ रहा हैं. यहाँ भी वजह संघ कार्यकर्ता पर हाथ डालना हैं. लेकिन इस मामले में शिवराज सरकार ने उनका तबादला करने की बजाय उन पर हत्या, डकेती, लूटपाट, गुंडागर्दी आदि के मामले डालकर अपराधी बना दिया.

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