कोलकाता हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी द्वारा कथित तौर पर पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ मालदा में हाल ही में हुआ विरोध पूर्वनियोजित था। केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल सरकार ने दावा किया है कि इस विरोध प्रदर्शन की योजना हालांकि पहले से बनाई गई थी, लेकिन यह कोई सांप्रदायिक हमला नहीं था। राज्य सरकार ने कहा है कि प्रस्तावित रैली की योजना पहले से तैयार थी, लेकिन इसके दौरान हुई हिंसा पहले से बनाई गई किसी साजिश का हिस्सा नहीं थी।
malda-kamlesh-tiwari759-620x4003 जनवरी को इदारा-ए-शरिया द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्षन में लगभग 7 मुस्लिम संगठन और 10 स्थानीय मुस्लिम युवा क्लब शामिल हुए थे। विरोध के लिए जमा हुई भीड़ एकाएक हिंसक हो गई, जिसके बाद दंगे जैसी स्थिति पैदा हो गई। भीड़ ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में घुसकर तोड़फोड़ की और थाने को जलाकर फूंक डाला। राज्य सरकार ने केंद्र को इस घटना के ऊपर जो रिपोर्ट भेजी है, उसमें दावा किया गया है कि यह घटना एकसाथ फूटे जनता के गुस्से का नतीजा थी।

पश्चिम बंगाल में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। बीजेपी इस घटना को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है, वहीं ममता बनर्जी की सरकार ने इस इलाके में किसी भी तरह की राजनैतिक सक्रियता पर प्रतिबंध लगा दिया है। किसी भी अन्य पार्टी के नेताओं को यहां आने की इजाजत नहीं दी गई।

इस रिपोर्ट में राज्य सरकार की ओर से कहा गया है कि कालीचक में जमा हुई भीड़ 2 समूहों में थी। एक समूह में जहां अफीम की खेती करने वाले, जाली नोटों का धंधा करने वाले और तस्कर थे, वहीं भीड़ में शामिल दूसरा समूह उन लोगों का था जो कमलेश तिवारी के विवादित बयान को लेकर गुस्सा थे। तस्करों और अवांछित तत्वों ने भीड़ के एक धड़े को भड़काया और भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया। स्थानीय पुलिस पर हावी होकर भीड़ बेखौफ हो गई और उपद्रव मचाने लगी।

रिपोर्ट के मुताबिक इस हादसे में किसी की जान जाने की खबर नहीं है। बताया गया है कि पुलिस ने इस घटना के सिलसिले में 11 दंगाइयों को गिरफ्तार किया है, जबकि इदारा-ए-शरिया के नेता अभी भी फरार बताए जा रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह भी है कि यह संगठन खासतौर पर इस विरोध प्रदर्शन को आयोजित करने के लिए बनाया गया था और इसने इस इलाके में इसी मकसद से अपना एक दफ्तर भी खोला। रिपोर्ट के मुताबिक, जांच में पाया गया है कि इस विरोध रैली की तैयारी और लोगों के बीच इसका प्रचार करीब एक महीने पहले से ही किया जा रहा था। मालूम हो कि इस प्रदर्शन में हजारों की तादाद में लोग जमा हुए थे।

इस घटना के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सबसे पहले सीमा सुरक्षा बल पर आरोप लगाया। बीएसएफ ने इस घटना में अपनी किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया और कहा कि उसकी एक गाड़ी रैली के बीच में फंस गई थी, लेकिन बाद में रैली के लोगों ने उन्हें बिना नुकसान पहुंचाए जाने दिया।

उधर सीपीएम और कांग्रेस सहित विपक्षी दल इस घटना का राजनैतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक किसी भी नेता को इस इलाके में घुसने की इजाजत नहीं दी है। राज्य सरकार का कहना है कि जबतक यहां हालात काबू में नहीं आ जाते, तबतक किसी भी राजनैतिक दल या फिर इसके नेता को यहां आने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

इससे पहले, बीजेपी नेता व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को मालदा में रैली करने की इजाजत नहीं मिली थी। बीजेपी की ओर से इस जगह का दौरा करने आए एक प्रतिनिधि मंडल को भी रेलवे स्टेशन पर ही रोककर वापस भेज दिया गया था।

घटना में जलाए गए पुलिस थाने को फिर से बनाने का काम चल रहा है। इस बार थाने के चारों ओर एक मजबूत दीवार भी खड़ी की जा रही है। साभार: नवभारत टाइम्स


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