जयपुर: राजस्थान  सरकार के नए आदेश के अनुसार , लाखों बच्चे शिक्षा के अधिकार कानून के दायरे से बहार हो जाएंगे। पहले ढाई लाख से कम वार्षिक आय वाले सभी गरीब परिवार निजी स्कूलों में शिक्षा के अधिकार के तहत आवेदन दे सकते थे। उनका लाटरी के जरिए दाखिला तय होता था। लेकिन अब राजस्थान सरकार के 28 मार्च 2016  के एक आदेश के मुताबिक सिर्फ बीपीएल कार्ड धारक परिवारों के  बच्चे और एससी-एसटी  वर्ग के बच्चे शिक्षा के अधिकार का फायदा लेते हुए प्राइवेट स्कूलों में एडमीशन ले पाएंगे।

school childrenशिक्षा का अधिकार के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं का मानना  है कि राजस्थान में इस आदेश के कारण करीब तीन लाख बच्चे शिक्षा का अधिकार कानून के दायरे से बहार हो जाएंगे।

उदाहरण के तौर पर चार साल की ज़ारा शिक्षा का अधिकार कानून के तहत जयपुर के विद्यासागर स्कूल में पिछले एक साल से पढ़ रही है। उसके सात भाई बहन हैं और उसके पिता उस्मान मदारी परिवार से हैं। वह जगह-जगह मेलों, गली-नुक्कड़ों, बाजारों में जादू और करतब दिखाकर गुजर-बसर करते हैं। ज़ारा की बड़ी बहन जावेदा की पढ़ाई-लिखाई एक एनजीओ के जरिए हो रही है। उस्मान के पास इतने पैसे नहीं हैं कि सभी बच्चों की फीस दे सकें। लेकिन राजस्थान सरकार के शिक्षा का अधिकार (आरटीई) को लेकर नए आदेश के अनुसार अब ज़ारा और जावेदा के भाई-बहन इस अधिकार के तहत आवेदन नहीं कर पाएंगे।

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28 मार्च 2016 के एक नोटिफिकेशन के तहत केंद्र और राज्य सरकार के तहत गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) के परिवारों के बच्चे अब आरटीई में  “वीकर सेक्शन”  की परिभाषा में माने जाएंगे। इसके साथ-साथ अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अनाथ, युद्ध में शहीदों के बच्चे, कैंसर या एचआईवी ग्रस्त लोगों के बच्चे या फिर विकलांग शिक्षा का अधिकार कानून के तहत निजी स्कूलों में दाखिल ले पाएंगे। यह 2011 के उस नोटिफिकेशन को दरकिनार करता है जिसके तहत ढाई लाख से कम वार्षिक आय वाले लोग आरटीई का फायदा उठा सकते थे।

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जावेदा का कहना है कि “हमारे मां-बाप नहीं पढ़ सके तो हम चाहते हैं कि हम तो पढ़ लें।”  जावेदा के पिता उस्मान की वार्षिक आय करीब 90 हजार रुपये है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के अधिकार के तहत एक बच्ची पढ़ रही थी। उम्मीद थी कि उसकी छोटी बहन निफिल को भी शिक्षा के अधिकार के तहत किसी अच्छे स्कूल में पढ़ा देते। उन्होंने कहा कि “हमारे पास कुछ भी नहीं है। न तो बीपीएल कार्ड है, न पहचान पत्र है। सरकार हमारी नहीं सुनती है क्या करें? हम तो नहीं पढ़ पाए, लेकिन हम सोचते हैं बच्चे तो कुछ बन जाएं।”

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सरकार के इस आदेश के खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसकी सुनवाई 18 अप्रैल को है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रांजल सिंह का कहना है कि “सरकार की मंशा यह है कि आवेदन कम हों। ओबीसी और पिछड़े वर्ग के बच्चे इनकम सर्टिफिकेट के तहत आवेदन करते हैं। जो आवेदनकर्ताओं का करीब 40 प्रतिशत हैं। अब यह 40 फीसदी आवेदन कर ही नहीं पाएंगे।”

राजस्थान में 34,000  निजी स्कूल हैं जहां शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चे पढ़ते हैं। पिछले साल आरटीई के तहत एक लाख 65 हजार बच्चों को शिक्षा मिली, जो देश के सभी राज्यों में एक बेहतरीन रिकॉर्ड मानी जाती है। (khabar.ndtv.com)


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