हरियाणा में जाट आरक्षण को लेकर चल रही हिंसा व विरोध प्रदर्शन के बाद अब प्रदर्शनकारियों द्वारा पश्चिम बंगाल स्थित कूच बिहार को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर रेल सेवा बंद करने के बाद उत्तर-पूर्वी राज्यों से रेल संपर्क पूरी तरह कट गया है। अलग कूच बिहार राज्य की मांग के समर्थन में ‘कूच बिहार पीपल्स असोसिएशन’ (जीसीपीए) के हजार से भी अधिक कार्यकर्ताओं ने यहां रेलवे स्टेशन पर शनिवार सुबह 6 बजे से अनिश्तकालीन रेल रोको अभियान शुरू कर दिया। जानकारी मिलने तक, इस बंद के कारण पूरे उत्तरपूर्वी भारत से रेलवे संपर्क कट गया है। प्रदर्शनकारी कूच बिहार को अलग राज्य बनाने या फिर केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग पर अड़े हैं।

 रेलवे पटरी पर बैठे प्रदर्शनकारी। इस बंद के कारण कई गाड़ियां...

जीसीपीए के सचिव बांगशी बादव बर्मन ने कहा कि जब तक गृह मंत्रालय कूच बिहार को अलग राज्य बनाए जाने की घोषणा नहीं करता, तब तक यह रेल रोको जारी रहेगा। कई ट्रेनें रद्द हो गईं। कई गाड़ियां फंसी हुई हैं। असम के बंगाईगांव और नई जलपाईगुड़ी में एक-एक राजधानी एक्सप्रेस फंसी हुई हैं। बारपेटा में कामरूप एक्सप्रेस और नॉर्थ-ईस्ट एक्स्प्रेस फंसी हुई हैं। बामनहाट और सिलीगुड़ी के बीच 2 ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है।

जलपाईगुड़ी के देबज्योति सान्याल ने कहा, ‘मुझे एनजेपी से राजधानी पकड़कर डिब्रूगढ़ जाना था। 22 फरवरी को मेरी शादी है। मुझे नहीं पता कि अगर ये बंद नहीं खुला, तो क्या होगा।’ उत्तर बंगा ट्रेन में बैठे जीशु बनर्जी ने बताया, ‘मुझे सुबह 9.30 बजे कूच बिहार पहुंचना था। अब दोपहर के 1 बज गए हैं, लेकिन मैं फलाक्ता में ही फंसा हुआ हूं।’

एनजेपी के वरिष्ठ एरिया मैनेजर पार्थ सारथी सिल ने यात्रियों को यह कहकर शांत करने की कोशिश की कि स्थिति जल्द ही सामान्य कर दी जाएगी। उन्होंने कहा, ‘गुवाहाटी-झाझा एक्सप्रेस चल चुकी है और अब हम राजधानी ट्रेनों को चलाने की कोशिश कर रहे हैं।’

जीसीपीए के झंडे तले अलग राज्य की मांग सितंबर 2005 में उठी थी। 3 लाख से ज्यादा लोगों ने इस मांग के समर्थन में भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। 5 दिन बाद पुलिस के साथ गंभीर भिड़ंत के बाद यह खत्म हुआ था। इस घटना में कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकर्ता मारे गए थे।

इसके बाद पुलिस की सतर्कता और तत्कालीन राजनैतिक दिशा के कारण जीसीपीए को शांत रहना पड़ा था। संगठन की नींव रखने वाले बर्मन को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया गया था। उन्हें 2011 में रिहा कर दिया गया था। इसके बाद भी यह आंदोलन शांत रहा, लेकिन फिर तेलंगाना को अलग राज्य बनाए जाने के बाद यह फिर तेजी पकड़ने लगा। (नवभारत टाइम्स)


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