ख्वाजा साहब की नगरी अजमेर को सूफीज्म का अहम केंद्र माना जाता है। इतना ही नहीं तमाम सूफीयाना घराने और खानाकाहों की पहचान भी अजमेर से ही है। यहां सूफीज्म का सबसे बड़े मकरज सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जहां रोजाना भाईचारे और कौमी एकता के अनेक रंग देखने को मिलते हैं।

सूफीज्म की यही खूशबू रोजाना यहां हजारों लोगों को बिना किसी मजहबी भेदभाव के खीच लाती है। चाहे देश पर हुकुमत चलाने वाले बादशाह, राजा-महाराजा या विभिन्न मुल्कों के सियासी नेता, अभिनेता और आम जायरीन हों, सभी की आस्था का दर है यह। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हम सब भाई का नारा यहां हर रोज साकार होता है।

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कव्वालियों की शुरुआत अजमेर से

कव्वालियों को सूफीज्म का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है। खास बात यह है कि दुनिया में कव्वालियों की शुरुआत अजमेर से ही मानी जाती है। बताया जाता है कि करीब 850 साल पहले जब ख्वाजा साहब हिन्दुस्तान आए थे, उस वक्त यहां संगीत का बड़ा महत्व था। लोग भजन, कीर्तन, गीतों के माध्यम से ही अपनी भावनाओं का इजहार किया करते थे। इबादत का जरिया भी यही था। इसलिए गरीब नवाज ने कव्वालियों की शुरुआत की।

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गरीब नवाज की दरगाह में आज भी दिलो-दिमाग को झंकृत करने वाली कव्वालियां, पारम्परिक शहनाई और ढोल-ताशे अकीदतमंद को रूहानी सुकून पहुंचाते हैं। हजरत अमीर खुसरों ने भी यहां कई सूफियाना कलाम लिखे और गाए। शाही कव्वालों की ओर से शाम को पेश किए जाने वाले कड़का में तो ब्रज, फारसी, ऊर्दू, हिन्दी सहित सात भाषाओं का समावेश है। दरगाह में एक खूबसूरत महफिलखाना भी है, जहां विभिन्न मौकों पर महफिल सजती है और शाही कव्वाल गरीब नवाज की शान में कलाम पेश करते हैं। (Rajasthan Patrika)

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