रांची : राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आज यहां कहा कि भारत तेजी से आर्थिक उन्नति कर रहा है और बीस खरब अमेरिकी डालर की अर्थव्यवस्था के साथ आज वह दुनिया की नौवीं सबसे बडी़ अर्थव्यवस्था बन कर उभरा है लेकिन इस दौड़ में देश के 25 करोड़ से अधिक गरीबों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए.

दो दिनों के झारखंड दौरे के दूसरे दिन आज यहां निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के 88वें सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद बीआईटी मेसरा के हीरक जयंती एवं दीक्षान्त समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने यह बात कही.

राष्ट्रपति ने कहा कि आजादी के समय 1947 में दस लाख टन से भी कम वार्षिक इस्पात उत्पादन करने वाला भारत आज नौ करोड टन से भी अधिक वार्षिक इस्पात उत्पादन कर दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है, इसी प्रकार 1947 में एक लाख से भी कम आटोमोबाइल्स बनाने वाले भारत में इस समय प्रति वर्ष 38 लाख से अधिक आटोमोबाइल का निर्माण कर भारत दुनिया का छठां सबसे बडा़ आटोमोबाइल उत्पादक देश हो गया है और इसी प्रकार 27 करोड़ टन वार्षिक सीमेंट का उत्पादन कर भारत दुनिया का तीसरे नंबर का देश बन गया है. फिर भी उन्होंने आगाह किया कि विकास की इस दौड़ में देश को आगे रखना तो आवश्यक है लेकिन देश के 25 करोड़ गरीबों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि देश में गरीबी रेखा से नीचे के इन 25 करोड़ से अधिक लोगों के सामाजिक उत्थान को ध्यान में रखकर नीतियों का निर्माण होना चाहिए. राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने दो टूक कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि वही महान बनता है जो अपने लोगों के जीवन में परिवर्तन लाता है लिहाजा देश के गरीबों और किसानों के जीवन में बदलाव लाने के लिए देश को और विशेषकर शिक्षा क्षेत्र से जुडे़ लोगों को काम करना होगा.

उन्होंने कहा कि खरीददारी की ताकत (पर्चेसिंग पावर पैरिटी) के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया की तीसरी सबसे बडी़ अर्थव्यवस्था है और दुनिया में विकासशील देशों में भारत सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है. विकास के इस स्तर को कायम रखने के लिए तेजी से औद्योगिकीकरण की आवश्यकता है.

उन्‍होंने उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षा के स्तर में सुधार की बात आज दोहरायी और कहा कि विश्व के दो सौ सर्वोत्तम उच्च शिक्षण संस्थानों में भारत के सिर्फ आइआइटी दिल्ली और भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलूरु शामिल हैं लेकिन अनेक अन्य संस्थान इस वर्ग में शामिल होने के करीब हैं. इन संस्थानों को अपने कामकाज और शोध में बस थोडा़ सा बदलाव करना होगा. उन्होंने इस उद्देश्य से देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में आपसी शैक्षणिक विनिमय एवं शोध कार्यों में सहयोग पर बल दिया जिससे एक संस्थान की उपलब्धियों का लाभ अन्य संस्थानों को भी मिल सके. साभार: prabhatkhabar


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