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जयपुर। पहाड़गंज स्थित हिरा इंस्टीटयूशन मुस्लिम स्टूडेंट्स आगे्रनाज़ेशन कार्यालय में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुये राजस्थान उर्दू एकेडमी के पूर्व चेयरमेन सैयद हबीबुर्रहमान न्याज़ी ने कहा कि भारत इस्लामिक इतिहास की रोशनी में तो इतना पवित्र है कि यहाँ की होड़ कोई देश नहीं कर सकता।

भारत अकेला देश है जो अनेकता में एकता दर्शाता है। यह अकेला देश है, जहाँ ना केवल रंग बिरंगे धर्म हैं, बल्कि भाँत-भाँत की बोलियाँ भी हैं और अलग-अलग आस्थाऐं भी और हमारा देश सबका साथ, सबका सम्मान की पालीसी पर चल रहा है। पर यह बात अफ़सोस नाक है कि आज 70 वर्ष बाद भी भारत विकास के प्रति वहाँ तक नहीं पहुँच पाया है, जहाँ होना चाहिए। यदि भारत बिग पावर बनना चाहता है तो इसे दंगों पर कंट्रोल कर इस को अखंड रखना होगा और शरारती तत्वों पर पाबंदी लगानी होगी जो पिछले 70 वर्षों से अलग-अलग बहानों से देश के विकास में बाधा बने हुए हैं। हम तो ना कल विभाजन के हक़ में थे और ना आज हैं।

न्याज़ी ने इस अवसर पर आतंकवाद की निंदा करते हुए कहाः आज के इस विशेष प्रोग्राम में हम यह बात दोहराना चाहेंगे कि हमारे नज़दीक आई एस आई एस, तालिबान, अल-क़ाइदा, बोको हराम, जमाअ़त्तुद्दावा और हिज़बुल मुजाहिदीन सहित जितनी भी आतंकवादी संस्थाऐं हैं, उनका इस्लाम धर्म तथा इस्लामी शिक्षाओं से दूर-दूर तक कोई तअ़ल्लुक़ नहीं। हमारे नौ जवानों को आज के इस भयंकर ज़माने में इन संस्थाओं से चेतावनी की आवश्यकता है।

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1947 का रास्ता 1857 से हो कर गुज़रा, तब आज़ादी मिली- ख़ालिद अयूब मिस्बाही शेरानी

इस अवसर पर मुस्लिम स्टूडेंट आगे्रनाज़ेशन आफ इण्डिया के राष्ट्रीय अधयक्ष और हिरा इंस्टीटयूट के डीन आफ़ इस्लामिक डिपार्टमेंट मुफ़्ती ख़ालिद अयूब मिस्बाही ने 1857 की क्राँति में मुस्लिम उलेमा की भूमिका बताते हुए कहाः इस सच्चाई में कोई शक नहीं कि भारत की स्वतंत्रता के पीछे 1857 की क्राँती की बड़ी महत्व पूर्ण भूमिका है। यदि 1857 में मुस्लिम उलमा ने गोरों के खि़लाफ़ लड़ने का फ़तवा दे कर अ़ाम जनता को आज़ादी के लिए जान देने पर ना उभारा होता तो भारत भर में आज़ादी की मुहिम ना छिड़ पाती।

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अ़ल्लामा फ़ज़ले हक़ ख़ैराबादी ने अलवर रियासत से सर्व प्रथम अंगे्रज़ों के विरोध में फ़तवा दिया, बहादुर शाह जफ़र के साथ मिल कर उस फ़तवे पर अपने समय के चोटी के उलमा से दस्तख़त लिए और फिर जुमा के दिन दिल्ली की जामा मस्जिद में तक़रीर कर अ़ाम लोगों को इससे अवगत कराया। जिससे पूरी दिल्ली रियासत में एक होड़ सी बपा हो गई और लोग मुल्क के लिए मरने-मारने का जज़बा ले कर मैदान में कूद पड़े और धीरे-धीरे यह मुहिम इतनी अ़ाम हुई कि भारत के कोने-कोने में आग लग गई।

जगह-जगह अंगे्रज़ों ने लोगों को सलाख़ों पीछे धकेलना शुरू कर दिया। किसी को गोलियों से भून दिया गया। मौलाना किफ़ायत अ़ली काफ़ी मुरादाबादी को उनके खानदान के 21 लोगों सहित दरिया में डुबो दिया गया। ख़ुद अ़ल्लामा ख़ैराबादी को काले पानी की सज़ा सुनाई गई और वहीं उनका निधन हुआ और आज भी उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाले उस अ़ज़ीम सपूत की क़ब्र इण्डोमान में है और हम भारतीयों से अपना हक़ माँग रही है।

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शेरानी ने कोहराम न्यूज़ के संवाददाता से बातचीत करते हुए कहाः अ़ल्लामा फ़ज़ले हक़ ख़ैराबादी के साथ-साथ अ़ल्लामा किफ़ायत अ़ली काफ़ी मुरादाबादी, मौलाना इमाम बख़्श सहबाई, अ़ल्लामा इनायत अहमद काकोरवी, मौलाना अहमदुल्लाह शाह मदरासी और अ़ल्लामा रज़ा ख़ान बरेलवी आदी की भी बड़ी अहम भूमिकाऐं रहीं।

अ़ल्लामा रज़ा ख़ान बरेलवी ने अपने घोड़े अंगे्रज़ों से लड़ने वालों के लिए वक़्फ़ कर दिए। मौलाना अहमदुल्लाह शाह मदरासी ने जगह-जगह जा कर लोगों में तक़रीरें की और इस प्रकार जनता को अंगे्रज़ों के खि़लाफ़ उभारा। हम ने आज जो उन आज़ादी के हीरो लोगों को भुला दिया है, यह किसी भी तौर पर हमारे हित में नहीं।

हमें चाहिए कि अपने बच्चों, गलियों, मोहल्लों और शिक्षण संस्थाओं के नाम इन मुजाहिदों के नाम पर रखें विशेष रूप से अ़ल्लामा ख़ैराबादी का नाम घर-घर पहुँचाऐं और यही हम सरकार से भी अपील करते हैं कि इन हीरो के नाम पर विश्व विधालय, कालेज, स्वास्थय केंद्र और अन्य सरकारी इदारे हों ताकि हमारी नई नस्ल इन नामों को भूलने ना पाए।


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