सप्ताह के 6 दिन सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे के बीच शहनाज का यह...आगरा  कुल 650 स्क्वेयर फुट में फैला शहनाज का घर पलक झपकते ही क्लासरूम में तब्दील हो जाता है। सप्ताह में 6 दिन, सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक उनके घर में बच्चों की आवाजें सुनाई देती रहती हैं। कहीं कोई बच्चा पहाड़े दोहराता दिखता है, तो कहीं हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के अक्षर सीखते बच्चे दिखाई देते हैं। आस-पास से गुजरने वालों के कानों में इस घर के भीतर से आ रही 200 बच्चों की पढ़ाई की इकट्ठा आवाज पहुंचती है।

45 साल की शहनाज खुद 9वीं तक ही पढ़ी हुई हैं, लेकिन इसने उनके इरादों पर कोई दीवार नहीं डाली। उन्होंने अपने आस-पड़ोस के गरीब बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी ली है। दिलचस्प यह है कि इस मुस्लिम शिक्षिका के पास पढ़ने आने वाले सभी छात्र गैर-मुस्लिम हैं। शहनाज और उनके छात्रों के बीच धर्म की दीवार कभी आड़े नहीं आई। धर्म का अंतर बाहर की दुनिया में भले ही कितनी ही मारकाट करवाता हो, लेकिन शहनाज के घर के अंदर उनके और उनके छात्रों के बीच के ‘मजहबी फासले’ ने उनका रिश्ता मजबूत ही किया है।

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शहनाज को अपने इस इरादे में पति का भरपूर साथ मिला। उनके पति मुवीन खान को पत्नी के काम पर बहुत गर्व है…
शहनाज के घर के आस-पास मुस्लिम आबादी नहीं है। ऐसे में अपने रहने की जगह को बदलने की जगह शहनाज ने गैर-मुस्लिम अपने पड़ोसियों से दोस्ताना रिश्ता कायम किया। आज उनके यहां पढ़ने आने वाले छात्र उनको ‘मेरी स्कूल वाली आंटी’ कहकर बुलाते हैं। इन बच्चों के लिए शहनाज की जगह उनके अपने माता-पिता से कम नहीं है।

शहनाज बताती हैं, ‘शुरुआत में मेरे परिवार के सदस्यों को अपने ही खर्च पर गरीब बच्चों को पढ़ाने का मेरा इरादा सही नहीं लगा था। मेरे पति मुवीन खान ने मेरी बात को समझा और मेरा साथ दिया।’ शहनाज का सपना है कि वह इसी तरह गरीब और अभाव में जी रहे परिवारों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना जारी रख सकें। शहनाज खुद भी एक मां हैं। 4 बेटियों समेत उनके 5 बच्चे हैं। बच्चों को पढ़ाने के काम में शहनाज की मदद उनकी 2 बेटियां भी कर रही हैं। साथ ही पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहीं चार अन्य छात्राएं भी इन बच्चों को पढ़ाने में शहनाज का साथ दे रही हैं।

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शहनाज के पास पढ़ने आने वाले तमाम बच्चों में कोई भी मुस्लिम समुदाय का नहीं है, लेकिन इस बात का कोई अंतर उन्हें और उनके छात्रों पर नहीं पड़ता…

शहनाज के घर में 5 कमरे और एक बरामदा है। यहीं पर रोजाना 200 बच्चों को तीन अलग-अलग सत्रों में पढ़ाया जाता है। घर के तीन कमरों और एक बरामदे में कक्षाएं लगती हैं। शहनाज कहती हैं, ‘चूंकि इन बच्चों के अभिभावकों की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर है, ऐसे में बच्चों से पढ़ाई के लिए एक पैसा भी नहीं लिया जाता है। मैंने पिछले साल ही बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत के तीन महीनों में 90 बच्चे पढ़ाई के लिए आए। अब मेरे पास 200 छात्र हैं। मेरे लिए इन बच्चों को शिक्षा देना ऐसा ही है जैसे कि अल्लाह के सामने रोजाना 5 बार नमाज पढ़ना। यहां तक कि अल्लाह को भी इन बच्चों को जिंदगी भर कूड़ा चुनते देखकर खुशी नहीं होगी। फिलहाल मेरे पति और मेरा छोटा भाई इरशाद अली इस काम के लिए मेरी आर्थिक मदद करते हैं, लेकिन हमें और भी लोगों का साथ चाहिए होगा। मुझे उम्मीद है कि बच्चों की बेहतरी के लिए और भी लोग आगे आएंगे।’

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शहनाज के पति मुवीन खान को अपनी पत्नी के इरादों और उनके काम पर गर्व है। वह कहते हैं, ‘जब हम बूढ़े हो जाएंगे, तो ये बच्चे हमारा सहारा बनेंगे। अगर हमारे अपने खून के रिश्ते और बच्चे हमसे दूर हों, तब भी ये बच्चे हमारे साथ होंगे।’ (NBT)


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