नई दिल्ली : अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) और जामिया के अल्पसंख्यक दर्जा पर सरकार की ‘टेढ़ी नज़र’ के बाद अब नंबर उर्दू मीडियम स्कूलों का है. दिल्ली के कई उर्दू मीडियम स्कूलों पर गाज गिर चुकी है और कई पर अभी गाज गिरनी बाक़ी है.

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एक ख़बर के मुताबिक़ पिछले दिनों पुरानी दिल्ली में 7 इलाक़ों के ईवनिंग शिफ्ट के उर्दू मीडियम स्कूलों को एमसीडी ने यह कहकर बंद कर दिया कि ईवनिंग स्कूल में बच्चे कम हैं.

जबकि इस इलाक़े के काउंसलर आल मुहम्मद इक़बाल का कहना है कि –‘एमसीडी ने जो फैसला लिया है, वो ग़लत है. वो अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रही है. बच्चे कम नहीं हैं, बल्कि टीचर कम हैं और जो हैं उनका शैक्षिक स्तर टीचर कहलाने लायक भी नहीं है. ऐसे में एमसीडी को उर्दू शिक्षकों की बहाली व पहले से मौजूद अपने टीचरों का शैक्षिक स्तर बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए न कि स्कूल ही बंद कर देना चाहिए.’

कांग्रेस लीडर महमूद ज़या भी बीजेपी व आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि –‘उर्दू मीडियम स्कूलों को बंद करके सरकार उर्दू ज़बान को ही ख़त्म कर देने की साज़िश रच रही है. स्कूल में बच्चे न होने का बहाना ग़लत है. क्योंकि उसी पुरानी दिल्ली के गली शंकर वाली एक हिन्दी मीडियम स्कूल में सिर्फ़ 30 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन उसे तो किसी ने बंद नहीं किया.’

सिर्फ़ पुरानी दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे दिल्ली में कई उर्दू मीडियम स्कूलों में ताला जड़ा हुआ है. कई उर्दू मीडियम में तालीम देने वाले स्कूल बंद हो चुके हैं. और जो बाक़ी बचे हैं, उनका इंफ्रास्ट्रक्चर लगभग ध्वस्त हो चुका है. वो इतने खस्ताहाल हैं कि उन्हें कभी भी बंद किया जा सकता है.

सच तो यह है कि न मौजूदा और न पिछली दिल्ली सरकारों ने इन स्कूलों की सुध लेने की कोशिश की. दूसरी तरफ़ मुसलमानों के बीच उर्दू तालीम को लेकर फैली उदासीनता भी एक बड़ी वजह है. उर्दू के नाम पर ऊंची आवाज़ों में नारे बुलंद करने वाले रहनुमा भी खुद के बच्चों को अब उर्दू मीडियम स्कूलों में भेजना नहीं चाहते.

आरटीआई के ज़रिए मिले अहम दस्तावेज़ यह बताते हैं कि दिल्ली में कुल 29444 शिक्षकों के पद रखे गए हैं, जिनमें उर्दू भाषा के लिए सिर्फ 262 शिक्षकों के पद ही रखे गए हैं. जबकि यह दस्तावेज़ बताते हैं कि इनमें भी सिर्फ 70 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं. 192 यानी 73% शिक्षकों के पद फिलहाल रिक्त हैं. हालांकि पिछले हफ्ते 32 उर्दू टीचरों के बहाली की ख़बर फिलहाल उर्दू अख़बारों के ज़रिए मिल रही है.

यह कहानी सिर्फ़ राजधानी दिल्ली की ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों में भी उर्दू का यही हाल है. खास तौर पर राजस्थान, मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र में सैकड़ों उर्दू मीडियम स्कूल बंद कर दिए गए हैं.

दरअसल, देश में अल्पसंख्यकों की तालीम को लेकर मचे घमासान के बीच उर्द स्कूलों की यह हालत इस बात की ओर इशारा करती है कि अल्पसंख्यकों के तालीम व उनकी ज़बान को लेकर देश की शिक्षा व्यवस्था का पूरा ढांचा किस क़दर चरमरा चुका है.

मुसीबत तो यह है कि एएमयू व जामिया जैसे बड़े-बड़े संस्थानों के नाम पर शोर-गुल भी मच जाता है और लोगों की निगाहें भी चली जाती हैं. लेकिन गुमनामी का धूल फांकते इन उर्दू मीडियम स्कूलों के नसीब में ये भी नहीं है. जबकि इनके हालत की ख़बर सरकार से लेकर नीतियां बनाने वाले और मुस्लिम रहनुमाओं व नुमाइंदों तक सभी को है. बावजूद इसके इन उर्दू मीडियम स्कूलों को बचाने की कोई भी क़वायद किसी के भी तरफ़ से शुरू नहीं की जा रही है. हद तो यह है कि एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जा को लेकर बयान देने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री भी इस मसले पर चुप्पी साथ लेते हैं. शायद यह भी उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो. साभार: Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net


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