यह आरक्षण नेताओं की देन है। हमें आरक्षण का लाभ न पहले मिला है और न ही अब चाहिए। हमें केवल हमारा बेटा चाहिए। जिसकी इन दंगों में मौत हो गई। पीजीआई एमएस रोहतक के पोस्टमार्टम रूम के बाहर अपने बेटे मनजीत की लाश का इंतजार कर रहे जयभगवान कहते हैं कि हम दलित समुदाय से संबंधित हैं। जाट आरक्षण आंदोलन से हमारा कोई सरोकार नहीं।

बीते शुक्रवार को उग्र भीड़ ने उसके लड़के मनजीत को उस समय मार दिया जब वह फैक्टरी से वापस लौट रहा था। मनजीत अपने पीछे विधवा पत्नी के अलावा एक पांच वर्ष का बेटा और सात वर्ष की बेटी छोड़ गया है। जयभगवान के अनुसार जिन लोगों ने मनजीत को मौत के घाट उतारा उनकी कोई शिनाख्त नहीं हुई है। चार दिन तक उसके बेटे की लाश का पोस्टमार्टम इसलिए नहीं हो सका क्योंकि पुलिस रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी।

पुलिस आंदोलनकारियों से निपटने में व्यस्त थी इसलिए लाश को पीजीआई में रखा गया था। घटना वाले दिन को याद करके रो रहे जयभगवान ने बताया कि सूचना मिलने पर जबतक वह पीजीआई पहुंचे तब तक डाक्टरों ने उनके बेटे को मृत घोषित कर दिया था। उनके बार-बार कहने पर भी पुलिस व सेना में से कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया।

मनजीत की तरह ही इस आंदोलन का शिकार हुए 17 वर्षीय नितिन शर्मा के पिता सुरेंद्र शर्मा जोकि पेशे से टैक्सी चालक ने बताया कि उन्हें नहीं पता उनके बेटे का क्या कसूर था। आंदोलनकारियों ने किला रोड़ पर उसके बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी। रोहतक के बाबरा मोहल्ला निवासी सुरेंद्र के अनुसार वह किला रोड़ पर अपने रिश्तेदार की दुकान में हुई लूटपाट के बाद उनकी मदद के लिए गए थे। इसी दौरान आंदोलकारियों का एक समूह आया और उनकी आंखों के सामने नितिन को मौत के घाट उतार दिया। यह बताते ही सुरेंद्र फूट-फूट कर रोने लगते हैं। नितिन की मां सरोज ने केवल इतना ही कहा कि पचास वर्षों में उन्होंने रोहतक में इतना उपद्रव कभी नहीं देखा।

इस आंदोलन में गैर-जाट ही नहीं बल्कि जाटों ने भी कई अपनों को खोया है। झज्जर में सेना की गोली का शिकार होकर मारे गए अर्जुन सिंह के भाई भगत सिंह ने बताया कि उसका भाई महज 18 वर्ष का था वह सेना और आंदोलनकारियों की गोली का शिकार हो गया। अपने भाई को गंवाने वाले भगत सिंह का दावा है कि वह तथा उनका परिवार हमेशा से ही आरक्षण जैसे विवादों से दूर रहे हैं। घटना के दौरान अर्जुन अपने दोस्तों के साथ जा रहा था।

गोली लगने से अर्जुन की मौत हो गई जबकि उसके दोस्त घायल हो गए। इस आंदोलन के दौरान अब तक 19 लोगों की मौत हो चुकी है। आंदोलन में अपनो के गंवाने वालों के परिजन सरकार से आरक्षण की बजाए अपने परिजनों को मांग रहे हैं। आंदोलनकारियों को भले ही आरक्षण मिल जाए और सरकार आर्थिक नुकसान की भरपाई भी कर दे लेकिन जिन्होंने अपने पति, बेटे व भाई को खोया है उनकी वापसी कभी नहीं हो सकती। (राजस्थान पत्रिका)


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