हैदराबाद: नबी अकरम (सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) की बअसत और आमद के मुताल्लिक़ तक़रीबन तमाम मज़ाहिब की मज़हबी किताबों में तज़किरा मौजूद है। ईसाईयत, हिंदू मत, बुध मत, जैन मत, सिख मत भी नबी मुकर्रम (सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) के मुताल्लिक़ पैशन गोइयों और बशारतों को नक़ल कर चुके हैं, लेकिन उमत मुसलिमा पर ये ज़िम्मेदारी आइद होती है कि वो दुसरे मज़हबी कुतुब में मौजूद दीन इस्लाम के तज़किरा और आक़ाए दो-जहाँ (सल्लललाहु अलैहि वसल्लम)की अज़मत को इन मज़हब के मानने वालों के सामने पेश करते हुए दावत-ओ-इशाअत दीन हक़ का काम अंजाम दें।

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मौलाना अबदुल्लाह ने अपने ख़िताब के दौरान कहा कि नई नसल के उल्मा और नौजवान मुताला पर तवज्जो दे। उन्होंने इस बात पर अफ़सोस का इज़हार किया कि हमारे नौजवान उल्मा तक़ाबुली मुताला के लिए दुसरे मज़ाहिब की कुतुब से इस्तेफ़ादा के अहल नहीं हैं। उन्होंने बताया कि अगर मुस्लिम नौजवान खास्कर उल्मा संस्कृत, तौरात और इंजील की ज़बानें हम सीखते हैं और उन मुक़द्दस किताबों में मौजूद मुहसिन इनसानीत(स०)से मुताल्लिक़ मौजूद बशारतों और पैशन गोइयों को नक़ल करते हुए दावत देन का काम करते हैं तो यक़ीनन हमें बड़ी कामयाबी मिल सकती है।

मौलाना अबदुल्लाह ने बताया कि बुध मत के मानने वालों ने मुसलमानों पर जो मज़ालिम कीये हैं, वो इंतेहाई अफ़सोसनाक हैं लेकिन अगर गौतमबुद्ध की तालीमात की रोशनी में ही उन्हें ये बावर करवाया जाये कि तुम ख़ुद अपने मज़हब का गला घोट रहे हो तो शायद उन्हें एहसास होगा। उन्होंने बर्मा (रंगून), श्रीलंका और दुसरे ममालिक में जिस तरह बुध मत के मानने वालों ने मुसलमानों पर ज़ुलम-ओ-सितम किये हैं, उस के ख़ातमे के लिए ये ज़रूरी है कि मुस्लिम उल्मा मुताला के ज़रीये बुध मत के पेशवाओं से बातचित का आग़ाज़ करते हुए उन्हें इस बात का एहसास दिलाएँ कि जो मज़हब कीड़े मारने की भी इजाज़त नहीं देता, उस के मानने वाले कैसे क़त्ल-ए-आम कर सकते हैं?

मौलाना अलीम अशर्फ़ जाइसी ने इस मौके पर अपना मक़ाला पेश करते हुए हिन्दुस्तानी ग़ैरमुस्लिमों के तालीफ़ात में हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लललाहु अलैहि वसल्लम)के तज़किरे से मुताल्लिक़ तफ़सीलात पेश कीं। मौलाना निसार अलहसीरी अल क़ासिमी ने इबतेदाई ख़िताब के दौरान बताया कि दुनिया में फैल रही बेराहरवी हालात से नजात का वाहिद रास्ता सीरत उन्नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) से वाबस्ता इख़तियार करते हुए इस पर सख़्ती से कारबन्द होना है।

उन्होंने बताया कि फ़िक्र-ओ-नज़र को वुसअत देने के लिए ये ज़रूरी है कि हम सीरत मुहम्मदी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) पर गामज़न रहते हुए दुसरे अब्नाए वत्न को दीन मतीन का पयाम पहुँचाएं। मौलाना अबदुल्लाह तारिक़ ने अपने मक़ाला में हिंदू अज़म की चार वेदों और उनमें लिखी इबारतों-ओ-अश्लोक पेश करते हुए सनातन धरम में मुहसिन इनसानीत(सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) की तालीमात का हवाला दिया। (Siasat)


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