iqbalअलीगढ़: सर अल्लाम (डॉ०) मोहम्मद इकबाल भारतीय उपमहाद्वीप के ऐसे महान इस्लामिक विचारक, दार्शनिक और उर्दू तथा फारसी के कवि थे जिन्होंने धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

उक्त बातें सैयद मोहम्मद सिबतैन नक्वी फोरम फॉर मुस्लिम स्टैडीज एण्ड एनालिसिस (एफ०एम०एस०ए०) द्वारा अल्लामा इक़बाल की 137वीं जन्म शताब्दी के अवसर पर मीडिया सेन्टर अलीगढ़ मे अल्लामा इक़बाल और मानवीय मूल्य’’ विषय पर आयोजित एक चर्चात्मक बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि अल्लामा इकबाल ने अपनी कविताओं मे मानवीय संवेदना को व्यक्त करने का इतिहास रचा है।

डॉ० जसीम मोहम्मद ने कहा कि अल्लामा इक़बाल ने राष्ट्रीयता को भी नए आयाम दिए। उन्होंने कहा कि अक्सर अल्लामा इकबाल को देश के बँटवारे का जिम्मेदार माना जाता है परन्तु अल्लामा इकबाल के विरोधी उनके द्वारा रचित सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा भूल जाते हैं। उन्होंने कहा अल्लामा इक़बाल के समय मे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव हो रहे थे परन्तु अल्लामा की सम्पूर्ण व्यक्तित्व का आकलन किया जाना चाहिए जो हमारी सांझी संस्कृति का प्रतीक है।

डॉ० शीरिन मसरूर ने कहा कि अल्लामा इक़बाल बुनियादी तौर पर इस्लमिक चिन्तक थे और इसीलिए उनकी शायरी पर इस्लाम की छाप है। डॉ० आफताब आलम ने कहा कि अल्लामा इक़बाल का व्याक्तित्व बहुआयामी था। जहाँ एक ओर उनकी शायरी उन्हें दार्शानिक के रूप में स्थापित करती है वहीं दूसरी ओर उन्होंने समाज के हाशिये पर खड़े वर्ग पर भी आवाज़ उठाई।

प्रोफेसर हुमायू मुराद ने कहा कि तत्कालीन दो महान कवियों और दार्शनिको अल्लामा इक़बाल और रविन्द्र नाथ टैगोर जैसे लोगों पर हमें खुले रूप रचनात्मक मसीहा के रूप मे स्वीकार करना चाहिए।

चर्चा के अन्त में मुस्लिम फोरम ने प्रस्ताव परित करके केन्द्र सरकार से माँग की कि वह सभी केन्द्र और राज्यों के विश्वविद्यालय मे अल्लामा इक़बाल चैयर की स्थापना करें ताकि उनके जीवन ओर कार्यों पर शोध कार्य सम्पन्न हो और यूवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सकें।

चर्चा मे बड़ी संख्या मे शिक्षक, शोद्यार्थी और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा प्रमुख रूप से .डॉ० साबरी, फुरकान अली, मो० दिलशाद, काशिफ खान भी उपस्थित थे।


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