दिल्ली : गुवाहटी से तवांग जाने के रास्ते मे लगभग 12,000 फीट की उचाई पर बना है जसवंत का युद्ध स्मारक. उनकी शहादत की कहानी आज भी यहां पहुचने वालों के रोंगटे खड़े कर देती है.
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अकेले ही 300 सैनिक को उतारा था मौत के घाट
भारत और चीन के बीच नवंबर 1662 के युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए जसवंत सिंह की शहादत से जुड़ी सच्चाई बहुत ही कम लोगो को पता है. सेना की माने तो 12000 फीट की ऊचाई पर जब सारे सैनिक शहीद हो गए तब जसवंत सिंह पर सारी जिम्मेदारी आ गई और जसवंत सिंह ने शौर्यप्रदर्शन का बाहादुरी के साथ परिचय दिया. चौथी गढ़वाल राइफल इंफेटरी रेजीमेंट के जसवंत सिंह ने अकेले ही 3 दिनो तक चीनी सौनिकों से मुकाबला कर 300 चीनी सैनिको को मौत को घाट उतार दिया था.
यसंवत सिंह ने जब अलग अलग बंकरो से गोलीबारी की तब चीनी सैनिकों को लगा कि यहा भारी संख्या मे भारतीय सैनिक मौजूद है. इसके बाद चीनी सैनिको ने अपनी रणनीति बदलते हुए उस सेक्टर को चारो ओर से घेर लिया. तीन दिन बाद जसवंत सिंह चीनी सैनिको से घिर गए. जब चीनी सैनिको ने देखा कि एक अकेले सैनिक ने तीन दिनो से नाक मे दम कर रखा है. तो चीनी सैनिक चिढ़ गये और चीनी सैनिको ने जसवंत सिंह को बंदी बना लिआ और टेलीफोन तार के सहारे पेड़ पर फांसी पर लटका दिया.
नूरानांग की इस पोस्ट पर जसवंत सिंह का साथ गांव की दो लड़कियों ने भी दिया . शैला और नूरा की इन लड़कियों ने जसवंत सिंह को हथियार और असहले मुहैया करवाए.
जसवंत सिंह की बतादुरी के चलते सेना ने भी उनके लिए ऐसा काम किया जो आज भी एक मिसाल है. जसवंत सिंह को शहीद होने के साथ ही सेवानिवृत नही किया गया. जब उनकी रिटायरमेंट का समय आया तब ही उन्हे रिटायर किया गया . लगभग 40 साल बाद उन्हे रिटायर घोषित किया गया . इस बीच उन्हे समय-समय पर पदोन्नती भी दी गाई. (इंडिया संवाद)

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