“सोमवार सुबह मुरथल के पास नेशनल हाईवे-1 पर कुछ यात्रियों की कारों को रोका गया। कार में बैठी महिलाओं को खींच कर सामूहिक बलात्कार किया गया। मीडिया में आई खबरों के अनुसार 10 महिलाओं को खींचकर खेतों में ले जाया गया। उनसे बलात्कार कर उन्हें खेतों में छोड़ दिया गया। एक अखबार के अनुसार ‘सम्मान की खातिर’ इनके परिवार वालों को चुप रहने के लिए कहा गया है। हालांकि पुलिस बलात्कार की घटना को अफवाह बता रही है। ”

मीडिया में आई खबरों के अनुसार 30 से अधिक बदमाशों ने एनसीआर की तरफ जाने वालों को रोका, उनके वाहनों को आग लगाई। कई लोग जान बचाकर भागे, लेकिन कुछ महिलाएं नहीं भाग पाईं। उनके कपड़े फाड़ दिए गए और उनके साथ बलात्कार किया गया। इस खौफनाक वारदात की पीड़ित महिलाएं तब तक खेतों में पड़ी रहीं जब तक कि उनके पुरुष रिश्तेदार और गांव हसनपुर और कुराड के लोग कपड़े और कंबल लेकर नहीं आ गए।

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नाम उजागर न करने की शर्त पर एक चश्मदीद ने बताया-’तीन महिलाओं को अमरीक सुखदेव ढाबे पर ले जाया गया, जहां वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में अपने परिजनों से मिलीं। वे बेहोशी की हालत में मृतप्राय सी थीं। जिला प्रशासन के अधिकारी भी आ वहां गए, लेकिन मामले की जांच या पीड़ितों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बजाय परिजनों पर महिलाओं को घर ले जाने का दबाव बनाया गया। कई को वाहन भी उपलब्ध कराए गए।’

रविवार को हुई आगजनी के कारण हसनपुर और कुरड गांव के कई लोग भी सुखदेव ढाबे पर शरण लिए हुए थे। ढाबा मालिक अमरीक सिंह ने बताया कि उन्हें इस वारदात के बारे में तड़के 3 बजे के आसपास तब पता चला जब सड़क पर चल रहे कुछ लोगों ने महिलाओं की चीखें सुनी। उन्होंने बताया, ‘उनके ढाबे से करीब एक किलोमीटर दूर सड़क पर लगाए गए जाम को लाठीचार्ज के बाद सुरक्षाबलों ने हटा दिया था। कुछ बदमाश वहीं झाड़ियों में छिप गए।
वाहनों की आवाजाही के बाद वहां से सुरक्षाबलों के हटते ही ये लोग आ गए।’ एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया, ‘वाहनों को रोकने के बाद पुरुषों से भाग जाने को कहा। कुछ महिलाएं वहां रह गईं उनके साथ अमानवीय कृत्य हुआ।’
कुरड के युवक हरिकृष्ण और हसनपुर के जिले सिंह ने कहा कि वह वारदात की चर्चा भी नहीं करना चाहते। पुलिस ने अपराधियों को शरण दी होगी। कोई सुरक्षित नहीं महसूस कर रहा, यहां तक स्थानीय लोग भी।’

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ढाबा चलाने वाले जय भगवान ने बताया कि कुछ महिलाएं तो इन खूंखार लोगों के चंगुल से आश्चर्यजनक ढंग से बचके उनके ढाबे तक पहुंच गईं। उन्होंने बताया-’चार औरतें मेरे ढाबे पर लगी टंकियों के पीछे छिप गईं। तभी हमने सारी बत्तियां बुझा दीं, ताकि उनका पीछा कर रहे लोगों का ध्यान उनकी तरफ न जाए। वे वहां लगातार चार घंटों तक बैठी रहीं।’ कई लोगों ने इस बात की पुष्टि की कि पीड़ितों को ‘बदनामी से बचने के लिए’ मामले को न उठाने की बात समझाई गई। पीड़ित और उनके परिजनों की भीड़ के बीच इस मौके पर सेना के भी कुछ अधिकारी मौजूद थे। (आउटलुक)

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