रिहाई मंच ने बाराबंकी सेशन कोर्ट द्वारा 17 साल बाद कश्मीर निवासी गुलजार अहमद वानी और सिद्धार्थनगर के अब्दुल मोबीन को साबरमती एक्सप्रेस विस्फोट मामले में बरी किए जाने को खुफिया एजेंसियों की साम्प्रदायिक कार्यशैली और मानसिकता पर जोरदार तमाचा बताया है।

मंच ने कहा कि अगर सरकार में थोड़ी भी लाज-शरम होगी तो वो इन होनहार छात्रों की जिंदगी तबाह करने वाले खुफिया अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि गुलजार अमहद वानी का बरी होना खुफिया एजेंसियों के उस साम्प्रदायिक मानसिकता को बेनकाब करता है जो कश्मीरियों की आतंकी छवि बनाकर उनके खिलाफ आम हिंदुओं को उकसाते हैं। उन्होंने कहा कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय से अरबी साहित्य में पीएचडी कर रहे बारामुला जिले के गुलजार वानी व अन्य छात्रों को 2001 में खुफिया एजेंसियों और पुलिस ने सिर्फ इसलिए टारगेट कर फंसाया क्योंकि अलीगढ़ विश्वविद्यालय के छात्रों ने एक हॉस्टल में संदिग्ध गतिविधियां करते हुए रंगे हाथों पकड़े गए खुफिया एजेंसी के अधिकारी को प्रेस कांफ्रेस में पेश कर दिया था। जहां उसने यह स्वीकार किया था कि उसे ऊपर से आदेश था कि वो विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ देश विरोध के कुछ झूठे सुबूत इकट्ठा करे ताकि कुछ छात्रों को फंसाया जा सके। इस घटना के बाद से खुन्नस खाए खुफिया एजेंसी और पुलिस ने एएमयू को आतंकी गतिविधियों के केंद्र के बतौर प्रचारित कर वहां के छात्रों को आतंक के झूठे आरोपों में फंसाने का अभियान शुरू किया था। जिसमें पीएचडी छात्र गुलजार अहमद वानी को पुलिस ने कश्मीरी चरमपंथी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन और सिमी के बीच की कड़ी बताया था।

राजीव यादव ने कहा कि गुलजार वानी और अब्दुल मोबीन के बरी होने के बाद अलीगढ़ विश्वविद्यालय को आतंकवाद के नाम पर बदनाम करने वाले नेताओं और पुलिस अधिकारियों को देश की जनता से माफी मांगनी चाहिए।

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उन्होंने उत्तर प्रदेश की अदालतों पर आतंकवाद के फर्जी आरोपों में फंसाए गए बेगुनाहों के मामलों को जानबूझकर लटकाने का आरोप लगाते हुए कहा कि गुलजार वानी के मामले में 25 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जेएस खेहर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने यूपी सरकार को फटकार लगाई थी। बेंच ने कहा था कि ये शर्म की बात है कि एक शख्स आतंकवाद के 11 में से 10 मामलों में बरी हो चुका है, वो 16 साल से जेल में है और इसके बावजूद आप चाहते हैं कि उसे जमानत नहीं दी जाए। तब बेंच ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि सुनवाई 31 अक्टूबर 2017 तक पूरी की जाए नहीं तो 1 नवंबर 2017 को गुलजार को जमानत पर रिहा कर दिया जाए। आज गुलजार के बरी होने ने साबित कर दिया कि निचली अदालतें सरकारों के दबाव में मुकदमों को लटकाती हैं। राजीव यादव ने मांग की कि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामलों में निचली अदालतों द्वारा सरकार के दबाव में मामलों को लटकाने पर एक न्यायिक जांच आयोग का गठन करे ताकि इस अपराध में शामिल खुफिया-सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों व न्यायिक प्रक्रिया को लंबित करने वालों की शिनाख्त और उन पर कार्रवाई हो सके।

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रिहाई मंच ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि जब आपने गुलजार जैसे नौजवानों की इतनी लंबी जेल को शर्म की बात कही है तो ऐसे में इस मामले में विशेष हस्तक्षेप कर मुआवजे व पुर्नवास की सरकार से गारंटी करवाएं, जिससे देश के सामने गुलजार जैसे बेगुनाहों का मुकदमा एक नजीर बन सके।


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