बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बिहार को शराबमुक्त राज्य बनाने का सपना अब साकार हो चुका है, लेकिन गुजरात में इसे लेकर संशय है। गुजरात में आधिकारिक तौर पर शराब के ऊपर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन यहां रहने वाले कई लोग जानते हैं कि यह प्रतिबंध व्यवहारिक तौर पर कितना कारगर है। कागजों और सरकारी दस्तावेजों में गुजरात साल 1948 में शराबमुक्त घोषित किया गया है। महात्मा गांधी की जन्मस्थली होने के कारण और शराब पर उनकी गंभीर आपत्ति को ध्यान में रखते हुए गांधी के प्रति सम्मान के लिए यह प्रतिबंध लागू किया गया था।

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फरवरी 2015 से लेकर मार्च 2016 के बीच राज्य सरकार ने खुद शराब की दुकान खोलने के 16 परमिट जारी किए हैं। इसके साथ ही राज्य में सरकारी अनुमति से खुलने वाले दुकानों की संख्या 52 हो गई है। सरकार इसके पीछे ‘पर्यटन को बढावा देने’ का कारण गिनाती है। इन दुकानों पर शराब की बिक्री काफी ज्यादा होती है। केवल 5 मार्च के दिन का ही आंकड़ा देखें, तो इन दुकानों पर 2,282 परमिट होल्डरों को 70.74 लाख कीमत की शराब बेची गई।

गुजरात में रहने वाले कोई भी इंसान आपको यह बताएगा कि यहां शराब की डिलीवरी की व्यवस्था बिल्कुल ऐसी ही है जैसे पिज्जा की डिलीवरी होती है। बिल्कुल समय पर और बिना किसी पाबंदी के शराब का ऑर्डर घर पहुंच जाता है। 70,300 कानूनी परमिट होल्डरों के अलावा भी आपको आसानी से शराब उपलब्ध हो जाती है।

गुजरात में शराब पीने के लिए डॉक्टरी सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ती है। आपको एक डॉक्टर से पर्ची पर इतना लिखवाना होगा कि आपको नींद ना आने की बीमारी है, या फिर यह कि आप अवसाद से ग्रस्त हैं या फिर आपको दिमागी भ्रांतियां होने की दिक्कत है। डॉक्टर को लिखना होगा कि आपको सोने और शांति से रहने के लिए शराब की जरूरत है। इस स्वास्थ्य परमिट आवेदन के लिए 1,550 रुपये देन होते हैं। इसके बाद इस प्रमाणपत्र के साथ सिविल सर्जन के पास आवेदन करना होता है। कई बार आवेदन पर मंजूरी देने से पहले लोगों को ‘रोगी कल्याण समिति’ ट्रस्ट फंड में सहयोग राशि देने को कहा जाता है। इस अनुमति के लिए न्यूनतम आयु 40 साल है और इसके जारी होने के बाद परिस्थितियों और हालात को ध्यान में रखते हुए महीने में तीन से चार बोतल शराब खरीदने की अनुमति होती है।

आज की तारीख में गुजरात को शराब की आपूर्ति कराने वाली जगहों में चंडीगढ़ पहले पायदान पर है। चंडीगढ़ में कई कंपनियां तो गैरकानूनी तरीके से तयशुदा स्टॉक से ज्यादा शराब का उत्पादन करती हैं, ताकि इसे गुजरात में बेचा जा सके। श्यामलाजी, खेरवाड़ा, पीथोल, अलीराजपुर रोड, दीव, दमन गैरकानूनी शराब के सबसे मुख्य केंद्र हैं। हालांकि बिहार में शराबबंदी लागू कर नीतीश कुमार ने उत्पाद शुल्क में सालाना 4,000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगा लिया होगा। बिहार की आबादी 10.38 करोड़ है। गुजरात उत्पाद शुल्क के अधिकारियों का कहना है कि शराबबंदी के कारण उन्हें 5,200 करोड़ रुपये का नुकसान होता है, जबकि गुजरात की आबादी बिहार से काफी कम यानी 6.04 करोड़ ही है।

हाल ही में ठाकुर क्षत्रिय सेना के अल्पेश ठाकुर ने गुजरात सरकार को शर्मसार करते हुए अपनी ‘जनता रेड टीम’ बनाई और गैरकानूनी देसी शराब बनाने वालों पर छापेमारी करना शुरू कर दिया। वह बताते हैं, ‘हमारे समुदाय के 18 से 35 साल के बीच के लगभग 30 हजार पुरुष हर साल शराब पीने के कारण मर जाते हैं। उत्तरी और केंद्रीय गुजरात में यह काफी बड़ी समस्या है और हमने इसी हिस्से में छापेमारी की। सबसे कम साक्षरता दर वाले समुदायों में ठाकुर समुदाय भी शामिल है। हमारे समुदाय के लोग शराब बेचने के धंधे में भी हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘बिहार में शराबबंदी कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए जब 10 साल जेल की सजा तय की गई है, तो ऐसा ही गुजरात में भी क्यों नहीं हो सकता है।’

रिटायर हो चुके सहायक DGP एम.एम. मेहता ने हमें बताया, ‘शराबबंदी योजना प्रभावी और कारगर नहीं हुआ। एक ओर इससे भ्रष्टाचार होता है। शराब पर प्रतिबंध का एक फायदा जो हमें दिखता है वह यह है कि गुजरात में महिलाएं अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। यहां शहरों में लगभग 3 से 4 हजार के करीब शराब की तस्करी करने वाले सक्रिय हैं। कुछ तस्कर छोटे स्तर पर काम करते हैं। लोगों के पास शराब की होम डिलिवरी के लिए भी लड़के हैं।’

अगर शराबबंदी विभाग द्वारा साल 2010 की गई छापेमारी के आंकड़ों पर गौर करें, तो पिछले 5 साल के दौरान जब्ती में 230 फीसद इजाफा हुआ है। 2010 मे जहां विभाग ने 30.56 लाख शराब की बोतलें जब्त कीं, वहीं 2015 में 70.29 लाख बोतलें जब्त की गईं।


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