पूरा देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के 70 बरस पुरे होने पर स्वतंत्रता दिवस की 70वी सालगिरह मना रहा, वहीँ छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में माओवादियों ने देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के बजाय काला झंडा फहराया.

बीजापुर के तर्रेम, पुसबाका, कैका, ताकिलोड़, कंचाल, तारुड़ और सुरनार समेत 50 से भी अधिक गांव ऐसे हैं, जहां राष्ट्रीय पर्व नहीं मनाया गया. इन इलाकों में संचालित स्कूल, आश्रम, आंगनबाड़ी और हॉस्पिटल में स्वतंत्रता दिवस के दिन माओवादी काला झंडा फहराकर स्वतन्त्रता दिवस और राष्ट्रीय ध्वज का विरोध करते हैं.

इन इलाकों में पदस्थ शासकीय कर्मचारी भी माओवादियों की बन्दूक की नोक पर विवश होकर अपनी मौन सहमति दे देते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक जब कभी कोई माओवादियों के इस फरमान का विरोध कर तिरंगा फहराता है, तो उसे सजा के तौर पर माओवादी सीधे मौत के घाट उतार देते हैं.

15 अगस्त हो या 26 जनवरी, हर राष्ट्रीय पर्व पर इन इलाकों में सुबह से ही सशस्त्र माओवादी स्कूलों, आश्रमों, पंचायत भवनों या हॉस्पिटल में पहुँच जाते हैं और राष्ट्रीय पर्व का विरोध करते हुए सरकारी संस्थानों पर काला झंडा फहरा देते हैं.

ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय पर्व पर अंदरूनी इलाकों में माओवादियों के काला झंडा फहराए जाने की सूचना पुलिस को नहीं है। पुलिस के मुताबिक 15 अगस्त और 26 जनवरी को अधिकांश अंदरूनी इलाकों में गश्त सर्चिंग के लिए उपलब्ध सुरक्षा बल के जवानों को रवाना किया जाता है

 ये जवान उन इलाकों में ग्रामीणों को एकत्र कर तिरंगा झंडा फहराते हैं, मगर कुछ इलाके ऐसे भी रह जाते हैं, जहां तक पुलिस नही पहुँच पाती। उन इलाकों में माओवादी काला झंडा फहराकर स्वतन्त्रता दिवस का विरोध करते हैं.


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