छत्तीसगढ़ में मुसलमानों के दो फ़िरक़े एक बार फिर आमने सामने आ गए हैं. देवबंदी और बरेलवी दोनों ही सुन्नी मुसलमान होते हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में इनके बीच की दूरियां बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं. हालात ये है कि बरेलवी क़ब्रिस्तान में देवबंदियों को दफ़न तक नहीं होने देते हैं. राजनंदगांव में एक ऐसे ही मामले में 2013 में एक देवबंदी महिला को तब दफ़नाया जा सका जब मामला हाईकोर्ट में पहुंचा और उसके आदेश दिए गए.

हाल का मामला बिलासपुर के पेड्रारोड का है जहां तब्लीग़ी जमात अपना इज्तिमा आयोजित करने वाली थी. 13 से 15 फ़रवरी को हो रहे इस इज्तिमा को पहले प्रशासन ने अनुमति दे दी थी. लेकिन अचानक बरेलवियों की आपत्ति के बाद बिलासपुर कलेक्टर ने इस पर रोक लगा दी थी. ख़बर मिलते ही तब्लीग़ी जमात के लोगों ने बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की और कलेक्टर के आदेश पर स्टे ले लिया. इसके बाद ये इज्तिमा शुरु हो सका है.

बिलासपुर पुलिस अधीक्षक अभिषेक पाठक ने बताया, “जो हाईकोर्ट का आदेश है उसके मुताबिक़ शर्तो के आधार पर इन्हें अनुमति मिली है. उसी आदेश के तहत इसे अब आयोजित किया जा रहा है.”

तब्लीग़ी जमात विचारधारा के स्तर पर देवबंदी कहलाते हैं.

देवबंदी उन्हें कहा जाता है जो दारुल उलूम देवबंद मदरसे की विचारधारा का समर्थन करते हैं. इन्हें आमतौर पर ज़्यादा कट्टर और सऊदी अरब से क़रीबी माना जाता है. वहीं बरेलवी वो लोग है जो सूफ़िज़्म में विश्वास रखते हैं. ये लोग आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान को मानते हैं, जो बरेली के रहने वाले थे और उनके मानने वालों को बरेलवी कहा जाता है.

इस मामले को लेकर कोर्ट गए मोहम्मद आसिफ़ भाभा इसमें राजनीति देखते हैं.

वो बताते है, “चंद बरेलवी लोगों की आपत्ति के चलते प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी थी. प्रशासन ने इसमें हमारा पक्ष भी नहीं जाना था यही वजह है कि हमें हाईकोर्ट जाना पड़ा. अब इज्तिमा शुरु हो गया है. उन्होंने प्रशासन को ये भी कहा था कि क़ानून व्यस्था की स्थिती बिगड़ सकती है. जबकि क़ानून व्यवस्था को संभालने का काम प्रशासन का है.”

उनका कहना है कि राजनीति के चलते कुछ लोग इन में नाइतेफ़ाक़ी पैदा कर रहे हैं ताकि एक वर्ग का वोट हासिल किया जा सकें. छत्तीसगढ़ में मुसलमानों की आबादी मात्र 2 प्रतिशत है जो लगभग 5 लाख के क़रीब है. इनमें बरेलवी लगभग 80 प्रतिशत हैं जबकि बाक़ी 20 प्रतिशत देवबंदी है.

यही वजह है कि बरेलवी, देवबंदियों को अपनी मस्जिद में नमाज़ नहीं पढ़ने देते हैं और क़ब्रिस्तान तक में उन्हें दफ़न नहीं करने देते हैं. जिसकी वजह से दोनों फ़िरक़ों में कड़वाहट लगातार बढ़ रही है. हालांकि मस्जिद और क़ब्रिस्तान सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अंतर्गत आते हैं जिनपर बरेलवी और देवबंदी दोनों का बराबर का हक़ है.

वर्गो में दूरियां इतनी ज़्यादा हो चुकी हैं कि मस्जिदों के बाहर ही कई जगह ये लिखा जाने लगा है कि मस्जिद में देवबंदी की जाने की इजाज़त नहीं है. वहीं बरेलवी समुदाय से ताअल्लुक़ रखने वाले ग़ुलाम सैलानी इसे आतंकवाद से जोड़ते हैं. उन्होंने बताया, “इन लोगों की वजह से ही आतंकवाद फैल रहा है और पूरी दुनिया में मुसलमान बदनाम हो रहा है. जो भी देश के अंदर आतंकवादी गतिविधियों में पकड़ में आता है वो इसी फ़िरक़े से ताअल्लुक़ रखता है. ये बताना ज़रुरी है.”

वो आगे आरोप लगाते हैं, “इन लोगों ने अपनी किताब में भी पैगंबर साहब के बारे में ग़लत बातें लिख रखी हैं जो हमें किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं है.” वहीं मोहम्मद आसिफ़ भाभा कहते हैं कि तब्लीग़ी जमात के इज्तिमा में कोई दुनियावी बात ही नहीं होती है. वहां सिर्फ़ नमाज़ और अपनी जिंदग़ी को सुधारने की बात की जाती है कुछ लोग दोनों में दुश्मनी चाहते हैं इसलिए ये फैला कर रखा है. (BBC HINDI)


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