वाराणसी. एक तरफ जहां पूरे देश में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पिछले दिनों हुई घटना की आलोचना-समालोचना हो रही है। आरोप-प्रत्यारोप लग रहे। विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया गया। जेएनयू प्रकरण राजनीतिक मुद्दा बन गया है। वहीं अब शताब्दी वर्ष स्थापना दिवस पर बीएचयू में आरएसएस का पथसंचलन भी बड़ा मुद्दा बन गया है। बीएचयू से जुडे लोग मानते हैं कि यह महामना का अपमान है। विशाल व्यक्तित्व को बना दिया बौना।
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महामना की सोच को दे रहे संकीर्ण रूप
बीएचयू से जुड़े लोगों का कहना है कि कुछ खास तबके के लोग महामना की सोच को संकीर्ण रूप दे रहे हैं। अपनी संकीर्ण मानसिकता वाले चश्में से देख रहे हैं महामना के व्यक्तित्व को। महामना को समझे बिना उऩके व्यक्तित्व की कर रहे व्याख्या। इन लोगों का सवाल है कि क्या महामना ने बीएचयू की स्थापना हिंदू वादी संगठन की शरणस्थली के रूप में प्रयोग करने को की थी। यह तो उनका ध्येय कतई नहीं रहा। ऊंची-ऊंची बातें करने वाला बीएचयू प्रशासन देश के कर्णधारों को क्या दिशा देना चाहता है। बीएचयू से जुड़े और शहर के बुद्धिजीवी इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
 
बीएचयू एनी बेसेंट गांधी, लोहिया, जेपी, नरेंद्र देव का भी है
बीएचयू के स्थापना दिवस समारोह के मुख्य अतिथि रहे महात्मा गांधी। अध्यक्षता की एनी बेसेंट ने। एनी बेसेंट ही थीं जिन्होंने सेंट्रल हिंदू स्कूल दिया जहां बीएचयू की प्रारंभिक पढ़ाई शुरू हुई। राम मनोहर लोहिया इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे। लोक नायक जयप्रकाश ने यहां दाखिला लिया। लोकबंधु राजनारायण यहां के विद्यार्थी रहे। डॉ. राधाकृष्णन और आचार्य नरेंद्र देव इस विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रेक्टर रहे। महान वैज्ञानिक नार्लिकर यहां के छात्र रहे। डॉ. गोपाल त्रिपाठी जिन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेज को आईआईटी तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया। इस विश्वविद्यालय की पहली महिला छात्रसंघ उपाध्यक्ष रहीं अंजना प्रकाश मगर विश्वविद्यालय ने इन सभी को हासिये पर ला दिया है। क्या शताब्दी वर्ष में इन विभूतियों का स्मरण नहीं होना चाहिए।
 
संकीर्ण मानसिकता ने बीएचयू का कैनवस किया छोटा
महामना का व्यक्तित्व काफी विशाल था, जिसके नीचे तमाम झाड़-झंखाड़ पैदा हो गए। दरअसल ये संकीर्ण मानसिकता के लोग हैं जिन्होंने खुद को एक खाल में समेट रखा है। ऐसे लोग दूसरों को समाविष्ट कर ही नहीं सकते। ऐसा ही कुछ इन दिनों बीएचयू में चल रहा है। यह कहना है विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष शतरुद्र प्रकाश का। उन्होंने बीएचयू के मौजूदा कुलपति का नाम लिए बैगर उन पर आक्षेप लगाया। कहा कि जो गांधी, राधाकृष्णन, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. भगवान दास, नार्लिकर जैसी विभूतियों को विस्मृत कर सकता है उससे इससे ज्यादा अपेक्षा ही क्या कि परिसर में आरएसएस का पथसंचलन हो।�
 
युवाओं को ले जा रहे खतरनाक रास्ते पर
बीएचयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चंचल कहते हैं कि देश के विश्वविद्यालयों के भगवाकरण की साजिश देश को विनास के रास्ते पर ले जा रही है। ये दक्षिणपंथी ताकतें युवाओं को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं। सारी यूनिवर्सिटीज को एक ही रास्ते पर हांकने का प्रयास बेहद खतरनाक है। उन्होंने कहा कि वैसे बीएचयू में आरएसएस का पथसंचलन कोई नया नहीं है, डा.जोशी के कुलपति रहते भी ऐसा हुआ था पर शायद लोग उसका हश्र भूल गए हैं। उन्होंने कहा कि इससे बुरा क्या होगा कि एक विभाग का अध्यक्ष हाफ पैंट पहन कर परिसर में आरएसएस के लोगों के साथ मार्च करे। कल को कक्षा में कोई विद्यार्थी राजनीति के सैद्धांतिक मुद्दे पर सवाल करेगा तो क्या होगा जवाब उनके पास। उन्होंने कहा कि दरअसल आरएसएस और भाजपा के पास को अपना कोई विजन है नहीं। ये बस इंसानी सभ्यता को टुकड़ों में बांटने को तुले हैं। अडानी-अंबानी की सोच से इनकी अर्थव्यवस्था चलती है और संघ के इशारे पर शिक्षा और राजनीतिक विजन बनते हैं।
 
महामना ने भारतीय परंपरा, संस्कृति संरक्षण की बात की थी
 महामना को जानने और पढ़ने वालों का कहना है कि महामना ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय को सनातनी परंपरा, भारतीय संस्कृति और सभ्यता को सहेजने की बात जरूर की थी पर इसके भगवाकरण को जीते जी कभी प्रश्रय नहीं दिया। ऐसा मनीषी जो छात्रों को भारतीय परंपरा-संस्कृति से जोड़ते हुए अत्याधुनिक शिक्षा देने की सोच रखता हो वह छात्रों को रुढीवादी और कट्टरवादिता की शिक्षा कतई नहीं दे सकता। लेकिन महामना की सोच को अपने तरीके से ढाल कर संचालित करने का प्रयास पहले भी होता रहा है। इसी के तहत विश्वविद्यालय में कभी आरएसएस भवन तक बनवा दिया गया था जिसका विरोध लोकबंधु राजनारायण ने किया। पूर्व कुलपति कालू लाल श्रीमाली के कार्यकाल में उस भवन को जमींदोज कर दिया गया। लेकिन पिछले दो साल से परिसर में आरएसएस की गतिविधियां फिर से तेज हो गई हैं, जिसका नतीजा है कि बीएचयू के शताब्दी वर्ष स्थापना दिवस के बिना रोक-टोक आरएसएस स्वयंसेवकों को पथसंचलन किया। इतना ही नहीं आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि इस पथ संचलन को बीएचयू प्रशासन का भी प्रश्रय था। (up.patrika)

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