दस साल की मुस्कान अपने पड़ोस की आपा के साथ बैठकर धागे में मोतियाँ पिरो रही हैं. इसलिए ताकि घर के ख़र्च में अब्बू का हाथ बंटा सके. मुस्कान स्कूल नहीं जाती हैं, बल्कि यहीं की एक मस्जिद में पढ़ने जा रही हैं. गाँव छोड़े उसे अब तीन साल बीत गए हैं. मुस्कान के हालात हमेशा ऐसे नहीं थे.

मुज़फ्फरनगर में वर्ष 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद बाक़ी के गाँव वालों के साथ वो भी भागकर शामली आ गई थी. कैराना की आर्यापुरी पंचायत के पास बसी मुनव्वर हसन कॉलोनी की झुग्गियां ही अब उनका ठिकाना है. इन झुग्गियों में रह रहे बच्चे पिछले तीन सालों से स्कूल नहीं जा रहे हैं.

कैराना कैंप में दंगा पीड़ित

मुस्कान की अम्मा नसीमा बताती हैं कि उनकी बेटी पढ़ाई में काफी अच्छी हुआ करती थी, पर आस पास स्कूल नहीं होने की वजह से उसे पास की मस्जिद में पढने के लिए भेजा जा रहा है. वे कहती हैं, “उसे अच्छे नंबर आते थे. अंग्रेज़ी भी सीख ली थी. मगर तीन सालों में अब वो काफी पीछे हो गई है. यहाँ पास में कोई स्कूल नहीं है. कैराना यहाँ से काफी दूर है. अपनी बच्ची को कैसे भेजें?”

दंगा पीड़ितों के बीच काम कर रहे अफ़कार नाम के एक सामाजिक संगठन के अख़्तर अकरम कहते हैं कि राज्य सरकार चाहती तो आर्यापुरी के आस पास स्कूल बना सकती थी, जो उसने नहीं किया. उन्होंने कहा, “सर्व शिक्षा अभियान या शिक्षा के अधिकार के तहत भी स्कूल खोला जा सकता है. स्कूल नहीं होने की वजह से बस्ती के बच्चे शिक्षा से महरूम हैं.”

आर्यापुरी की इस कालोनी में दो तरह के बसेरे हैं. एक वो जो ईंटों के बने हैं, जिन्हें एक सामाजिक संगठन ने बनवाया है, दूसरे वे हैं, जो झोपड़ियां हैं. झुग्गियों में रहने वाले लोग वे हैं, जिन्हें तीन साल में कोई मुआवजा नहीं मिला है. यहाँ के रहने वाले मुहम्मद शाहिद कहते हैं कि उनका नाम मुआवज़े की सूची में सबसे ऊपर था.

कैराना कैंप में दंगा पीड़ित

वे कहते हैं, “मगर, फिर पता नहीं क्या हुआ और अब तीन साल बीत गए हैं. एक पैसा नहीं मिला.” यहीं सत्तर साल की हफ़ीज़न भी रहती हैं जो दंगों के बाद से आज तक सदमे में हैं. उन्होंने पैदा होने के बाद से अब तक ऐसा कभी नहीं देखा था. वे बताती हैं कि हिंदू और मुसलमान 2013 से पहले आपस में मिलजुलकर रहते थे.

मगर 2013 ने सबकुछ बदल दिया है. वे भारी आवाज़ में कहती हैं, “अब सबके बीच मन मुटाव हो गया है.” मुज़फ्फऱनगर के दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के लिए काम कर रहे संगठन जमीअत-ए-इस्लामी-ए-हिन्द के हक़ीमुद्दीन कहते हैं कि मुआवज़ा सिर्फ़ नौ गावों के लोगों को ही दिया गया था.

उनका कहना है कि अर्यापुरी की बस्ती में रहने वालों को सरकार ने पहले ज़मीन माफिया क़रार दिया. बाद मे बस्ती में शरण लेने वालों को फ़कीर कह दिया.  हकीमुद्दीन कहते हैं, “जहाँ दंगे नहीं हुए, वैसी कुछ जगहों से भी कुछ लोग डर से अपना घर बार छोड़कर चले आए हैं. ऐसे लोगों को सड़कों पर नहीं छोड़ा जा सकता है. इन्हें भी बसाया जाना चाहिए.”

कैराना कैंप में दंगा पीड़ित

फुगाना के रहने वाले फ़ुरकान उस दिन को याद कर सिहर उठते हैं जब उनके गाँव में दंगा भड़का था. वे कहते हैं कि जब उन्होंने किसी की लाश ज़मीन पर घसीटते हुए लोगों को देखा तो वे अपने परिवार के लोगों के साथ गाँव से भाग निकले. इन्हें भी कोई मुआवज़ा नहीं मिला है. अब न वे वापस लौटना चाहते हैं. न ही उनके साथ गाँव से भाग कर आए दूसरे लोग.

वे अब यहाँ अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत करना चाहते हैं. अपने गावों को छोड़कर तीन साल से झुग्गियों में रहने वालों के सामने अब नई तरह की चुनौतियां हैं. आजीविका के साथ साथ उन्हें बीमारियों से लड़ने की आदत डालनी पड़ रही है क्योंकि पूरे इलाक़े में एक भी शौचालय नहीं हैं.

यहाँ के रहने वालों को खुले में शौच करना पड़ रहा है. इसलिए बस्ती की बुज़ुर्ग महिला वसीला को अब बड़ी हो रहीं बच्चियों की सुरक्षा की चिंता सता रही है.  तीन साल एक लंबा अरसा होता है. मुनव्वर हसन कालोनी की तरह ही दंगा पीड़ितों की कई बस्तियां हैं.

इन्हें अब अपने गावं वापस लौट जाना चाहिए था या उनके लिए कोई ठोस व्यवस्था अब तक हो जानी चाहिए थी. पर कैम्पोंं मे रहने वाले इन लोगो को बस उम्मीद के सहारे ही दिन गुज़ारने पर मजबूर होना पड़ रहा है. (BBC)


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