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देहरादून | नोट बंदी के बाद सहकारी बैंकों को नकदी जमा करने और नए नोट बदलने की प्रक्रिया से दूर रखा गया था. सहकारी बैंकों को किसान की जीवन रेखा के तौर पर देखा जाता है. यहाँ से किसान लोन लेकर खाद और बीज खरीदते है. लेकिन क्या कारण थे जिनकी वजह से सहकारी बैंकों से यह अधिकार छीन लिए गए? इसका कारण अब धीरे धीरे सामने आ रहे है.

उत्तराखंड के सहकारी बैंकों में नोट बंदी के बाद काफी बड़ी रकम जमा हुई है. सूत्रों की माने तो नोट बंदी के पांच दिन के अन्दर ही इन बैंकों में करीब 235 करोड़ रूपए जमा किये गए. इतनी बड़ी रकम जमा होते ही आरबीआई ने सभी सहकारी बैंकों से पांच दिन के अन्दर हुए ट्रांजैक्सन की डिटेल मंगाई है. हालांकि बैंक अपनी सफाई में कह रहे है की यह पैसा करेंसी चेस्ट से हमारे पास आया था.

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दरसल नोट बंदी के अगले दिन सभी बैंकों को बंद रखा गया. 10 दिसम्बर से सभी बैंकों ने नकदी जमा करने और पुराने नोट बदलने का काम करना शुरू कर दिया. उस समय सहकारी बैंकों को भी नकदी जमा करने और पुराने नोट बदलने के अधिकार दिए गए थे. लेकिन कुछ दिनों बाद ही देश भर से सहकारी बैंकों की शिकायत आरबीआई को मिलने लगी. जिसकी वजह से 14 नवम्बर को आरबीआई ने सभी सहकारी बैंकों पर नकदी जमा करने और नए नोट बदलने पर रोक लगा दी.

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इन्ही पांच दिन के अन्दर उत्तराखंड के सभी सहकारी बैंकों में करीब 235 करोड़ रूपए जमा हुए. जब इस बारे में बैंक अधिकारियों से पुछा गया तो उन्होंने कहा की करेंसी चेस्ट में जगह न होने की वजह से इन बैंकों में पैसा ट्रान्सफर किया गया. हालाँकि आरबीआई इन तर्कों को मानने के लिए तैयार नही है इसलिए उन्होंने इन पांच दिनों के सभी ट्रांजैक्सन की डिटेल मंगाई है.

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उत्तराखंड में करीब 13 राज्य सहकारी बैंक है. इन सभी की जिला सहकारी बैंक के रूप में शाखाये भी है. सहकारी बैंक की बागडोर राज्य सरकार में होती है. इन बैंक के चेयरमैन राज्य सरकार में नियुक्त कोई मंत्री या सत्ता पार्टी को कोई भी दिग्गज नेता होता है. देश भर के सभी सहकारी बैंकों पर राजनितिक वर्चस्व हावी रहता है.


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