फैजाबाद – यह आधुनिक भारत के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है कि क्या गुमनामी बाबा (फैजाबाद के साधु) सचमुच नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे ? शुभ्रो नियोगी, सैकत रे समेत रिपोर्टरों की एक टीम ने कुछ लोगों से इस बारे में बात की। लोगों का मानना है कि गुमनामी बाबा कोई और नहीं बल्कि नेता जी ही थे, जो अपनी पहचान छिपाकर रहते थे। आगे पढ़िए, लोगों का इस बारे में क्या कहना है:

सुरजीत दासगुप्ता दिमाग पर काफी जोर डालने के बाद बताते हैं,’मैं उनके सामने बैठा था। मैंने चुपके से उनके चेहरे की ओर देखा। उनके चेहरे पर इतना तेज था कि मुझे तुरंत अपनी निगाहें नीची करनी पड़ीं। यह नजर मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता।’

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शुरुआती दो-तीन दिनों के बाद भगवान जी ने भरोसा कर लिया के ये युवा नियमों का पालन करेंगे और उन्होंने पर्दे खींचना बंद कर दिया। सुरजीत के मन में नेताजी को देखने की तीव्र इच्छा हुई और वह खुद को रोक नहीं सके। सुरजीत बताते हैं,’उनके चेहरे पर अद्भुत तेज था। उनकी आंखे, उनकी नजर सब कुछ अदभुत था। वह नेता जी ही थे। उनके बाल कम हो गए थे। उनकी लंबी दाढ़ी थी लेकिन नैन-नक्श बिल्कुल ही वैसे जैसा हम किताबों की तस्वीरों में देखा करते थे। उनकी आखें इतनी प्रभावी थीं कि मुझे तुरंत अपनी नजर नीची करनी पड़ी। मैंने महसूस किया वह देशभक्त, हम जिसकी पूजा करते आए हैं, महात्मा बन गया है।’

फैजाबाद की रीता बनर्जी भी बताती हैं कि भगवान जी कितने तेजस्वी थी। वह बताती हैं,’उनके चेहरे पर इतना तेज था कि मैं उनकी आंखों में नहीं देख पाती थी। भगवान जी मुझे फुलवा रानी और मेरे पति को बच्चा कहते थे।’ गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड साहिब के ज्ञानी गुरजीत सिंह खासला का भी कुछ ऐसा ही अनुभव है। खालसा बताते हैं,’मैं 17 साल का था, जब उनसे मिला। उनके चेहरा पर जो तेज था, मैं उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता।’

सुरजीत अब 64 साल के हैं। वह उन लोगों में से हैं जो यह मानते हैं कि भगवान जी ही नेता जी थे। वह भारत सरकार के साथ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, वह चाहते हैं कि सरकार नेता जी के बारे में सच लोगों के सामने लाए। सुरतीज मानते हैं कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मौत की बात सालों से चला आ रहा झूठ है, इसे खत्म किया जाए। सुरजीत के मुताबिक, भगवान जी साइबेरिया के जेलों के बारे में भी बताते थे।

बिजोय नाग (76 साल) भी भगवान जी से मिलने वाले में से एक हैं। वह एक प्राइवेट फर्म में ऑडिटर का काम करते थे। हालांकि उन्होंने कभी भगवान जी का चेहरा नहीं देखा लेकिन उनसे हुई हर मुलाकात बिजोय को अच्छी तरह याद है। बिजोय बताते हैं,’पहली मुलाकात में मैंने उनके पैर छुए जबकि वह पर्दे के पीछे ही रहे।’ मुझे आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा,’अब तुम्हारा सपना सच्चाई में बदल चुका है। मैं उस समय 31 साल का था और उनसे मिलकर रोमांचित था।’ बिजोय 1970-1985 के बीच भगवान जी से 14 बार मिले और उनका कहना है कि हर मुलाकात यादगार थी।

सुरजीत की भगवान जी से ज्यादातर मुलाकातें पुरानी बस्ती में हुईं। वहीं बिजोय से अयोध्या के ब्रह्मकुंड के पास मिले, जहां वह कुछ महीनों के लिए रहे। 1975-76 में बिजोय भगवान जी के ठीक बगल वाले कमरे में रहते थे। बिजोय बताते हैं,’मैं किसी भी समय उन्हें देख सकता था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना किया था और मैं उनकी अवज्ञा नहीं करना चाहता था। उन्होंने मुझसे अपने माता-पिता और स्कूल टीचर की फोटो जुटा कर देने को कहा था और मैंने वैसा ही किया।’ बिजोय कहते हैं कि हालांकि मैंने कभी उनकी ओर नहीं देखा लेकिन मुझे इस बात में जरा भी शक नहीं है कि वह नेता जी ही थे।

बिजोय की आंट लीला रॉय 1922 से जनवरी 1941 के बीच लगातार नेताजी के संपर्क में थीं। INA सीक्रिट सर्विस एजेंट पबित्रा मोहन रॉय ने दिसंबर 1962 में लीला को भगवान जी के बारे में बताया था। इसके अलावा नेताजी के दूसरे जानकार अतुल सेन ने उनके नीमसार आने की खबर का खुलासा कर दिया। अतुल ने 1930 में ढाका विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था। साल 1962 में उन्होंने उत्तर प्रदेश के तमाम जगहों का दौरा किया।

अप्रैल में वह नीमसार पहुंचे। नीमसार लखनऊ के पास एक तीर्थस्थान है। यहां उन्हें स्थानीय लोगों ने बताया कि एक बंगाली महात्मा शिव मंदिर में रहते हैं। यह सुनकर अतुल की जिज्ञासा और बढ़ गई और वह महात्मा से मिलने पहुंच गए। तमाम कोशिशों के बाद वह भगवान जी से मिल पाए और मिलते ही वह जान गए कि भगवान जी कोई और नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस हैं। अगले कुछ हफ्तों में वह कई बार भगवान जी से मिले।

अतुल 1962 में कोलकाता पहुंचे। वह बहुत खुश थे लेकिन साथ ही चौकन्ने भी। उन्होंने पबित्रा मोहन रॉय और इतिहासकार आर.सी.मजूमदार से यह बात बता दी। 28 अगस्त, 1962 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को चिट्ठी भी लिखी। उन्होंने चिट्ठी में लिखा,’नेता जी जिंदा हैं और भारत में ही हैं। वह आध्यात्मिक साधना कर रहे हैं। मैंने उनसे जितनी बात की है उससे लगता है कि मित्र देश अभी भी उन्हें दुश्मन नंबर 1 मानते हैं। उन्होंने बताया कि भारत सरकार और मित्र देशों के बीच एक सीक्रिट प्रोटोकॉल है। जिसकी वजह से भारत सरकार उन्हें मित्र देशों के हवाले करने के लिए बाध्य है। अगर आप मुझे नेताजी की सुरक्षा का भरोसा दिलाएं तो मैं उन्हें सबके सामने आने के लिए मनाऊंगा।’ लेकिन नेहरू ने ऐसे किसी सीक्रिट प्रोटोकॉल की बात मानने से इनकार कर दिया।

इस दौरान लीला रॉय आखिर तक भगवान जी की सेवा में लगी रहीं। 1963 से लेकर 1970 में भगवान जी के निधन होने तक वह उनके लिए पैसे और खाने-पीने की चीजें भेजती थीं। नेता जी को बंगाली डिशेज जैसे घोंटो, सुकतो और कीमा बहुत पसंद थीं। उनके जन्मदिन पर उनके परिवार के सदस्य और करीबी दोस्त उनके लिए मिष्टी दोई और खेजुर गुर पायेश भेजते थे।

ऐसा नहीं कि सिर्फ बंगाल के लोग ही भगवान जी से मिल रहे थे। दिसंबर 1954 से अप्रैल 1957 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री संपूर्णानंद और बनारसी दास गुप्ता भी लगातार भगवान जी के संपर्क में थे। पूर्व रेलवे मेंत्री घानी खान चौधरी भी भगवान जी से मिले थे। भगवान जी का सामान अब फैजाबाद के खजाने में रख दिया गया है।

News Courtesy NBT


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