जनलोकपाल की धुनों पर भारत की सड़कों को मदमस्‍त कर देने वाले नौजवानों के लिए फैसले की घडी आ ही गई. निर्मल यादव का कहना है कि दिल्ली और केंद्र की राजनीति में उलझकर जनलोकपाल का सपना फिलहाल सपना ही रह सकता है.

चार साल पहले अन्‍ना आंदोलन में जनलोकपाल को भारत में भ्रष्‍टाचार की समस्‍या का एकमात्र अचूक हथियार बताया गया था. अन्‍ना के सिपाही अब दिल्‍ली की सत्‍ता में हैं. हालांकि यह बात दीगर है कि केजरीवाल सरकार को फिलहाल दिल्‍ली को भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त कराने के लिए जनलोकपाल के ब्रह्मास्‍त्र को आजमाने की अपने ही मंत्रिमंडल से मंजूरी मिलने में नौ महीने लग गए.

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स्‍पष्‍ट है कि सत्‍ता का चाल और चलन उसे चलाने वालों के मुताबिक अपनी दिशा और दशा तो बदल सकते हैं लेकिन गति नहीं बदल सकते हैं. दुनिया जानती है कि टीम अन्‍ना के इन मजबूत सिपहसालारों ने जनलोकपाल के लिए हर कीमत चुकाने की बातें की थीं. बुधवार को विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरु होने के महज चंद दिन पहले विपक्ष ने केजरीवाल सरकार पर ऐसी दबाव की राजनीति अपनाई कि उसे फैसला करने को मजबूर कर दिया. हालांकि जनलोकपाल पर छाए संशय के बादलों के हवाले से मुख्‍यमंत्री केजरीवाल की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं बल्कि इसे प्रक्रियागत तकनीकी बारीकियों से निपटने की सरकार की रणनीति जरूर कहा जा सकता है.

सरकार ने फिलहाल जितने पत्‍ते इस मुद्दे पर खोले हैं उससे साफ है कि वह इस बार वैसी कोई गलती नहीं करेगी जो 49 दिन के पहले शासन में करके उसने अपनी सरकार को व्‍यर्थ की कुर्बानी का हिस्‍सा बना दिया. इस बार केजरीवाल पूरी परिपक्‍वता के साथ मंझे हुए सियासी दांव पेंच से केन्‍द्र सरकार को शह-मात के खेल में उलझा रहे हैं. कुल मिलाकर ताजा स्थिति यह है कि मजबूरी में ही सही लेकिन केजरीवाल सरकार ने नया जनलोकपाल कानून सदन से पारित कराने की मंजूरी दे दी. लेकिन अभी इस मुद्दे पर संशय के बाद मंडरा रहे हैं.

मंत्रिमंडल की बैठक के बाद उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया के बयान पर ध्‍यान दिया जाए तो यह साफ हो जाएगा कि आप सरकार के लिए चालू सत्र में यह बिल पेश कर पाना आसान नहीं होगा. दरअसल सिसोदिया ने पुराने दिल्‍ली लोकायुक्‍त कानून 1994 की जगह नया जनलोकपाल बिल 2015 पेश करने की बात कही. अगर सिसोदिया की य‍ह बात सही है तो फिर हाल ही में मुख्‍यमंत्री केजरीवाल द्वारा जनलोकपाल बिल को समूची प्रक्रिया के दायरे से गुजारने का आश्‍वासन संदेह के घेरे मे आ जाता है.

वास्‍तविकता यह है कि अगर सरकार नया कानून बनाकर अपनी मर्जी का लोकपाल बनाना चाहती है तो नया कानून सदन में पेश करने से पहले केजरीवाल सरकार को केन्‍द्र और उपराज्‍यपाल की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है. जबकि महज 10 दिन के इस सत्र में नया कानून पेश करने के लिए केन्‍द्र की मंजूरी लेने की औपचारिकता पूरी करना मुमकिन नहीं है. साथ ही अगर केजरीवाल की बात सही मानी जाए तो मनीष द्वारा नया बिल पेश करने की बात संदेह के घेरे में आ जाती है. कुल मिलाकर यह तो समय ही बताएगा कि इस सरकार ने क्‍या रणनीति बनाकर चतुर सुजान मोदी सरकार को घेरने की तैयारी की है. लेकिन इतना तो तय है कि केजरीवाल सरकार इस बार कानून की पगडंडियों में उलझने के बजाय मौजूदा दिल्‍ली लोकायुक्‍त कानून 1994 में ही संशोधन प्रस्‍ताव के माध्‍यम से बदलाव कर जनलोकपाल की मंजिल हासिल करना चाहेगी. नतीजा जो भी हो लेकिन इस सबके बीच केजरीवाल ने खुद को 49 दिन के मुख्‍यमंत्री से उलट सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी के रूप में पेश कर अपने विरोधियों को भी भविष्‍य की बड़ी चुनौती का संकेत दे दिया है. आगामी सप्‍ताह ही बताएगा कि जनलोकपाल के नाम पर हो रही नूराकुश्‍ती का नतीजा हकीकत में बदलेगा या फिर अफसाना साबित होगा.

 


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