हमला, जंग, सेना और फतह जैसे भारी-भरकम शब्द सुनकर भले किसी की बांहें फड़कती हों, पर 108 साल की बिस्मिल्लाह खां के परिवार में ये चाय की चुस्कियों के साथ चलने वाली रोजमर्रा की बातों का हिस्सा हैं. बच्चे भी वही बातें सुनते रहते हैं और किशोरवय पार करते न करते सीधे सेना में. ताजा भर्ती 19 साल के इमरान की है.

साल भर पहले भर्ती यह किशोर हाल ही में ट्रेनिंग पूरी करके अहमदाबाद तैनाती पा चुका है. यानी परिवार की पांचवीं पीढ़ी भी मुल्क की हिफाजत में तैनात. यह किस्सा है झुंझुनू जिले के नुआं गांव का. यहां के जंगी किस्सों वाले बिस्मिल्लाह खां के परिवार में जब सेना से रिटायर्ड बेटे उनके पास आ बैठते हैं तो शुरू हो जाता है जंग का आंखों देखा हाल. किस्से में दुश्मन पाकिस्तान हो तो जोश दोगुना.

शेखावाटी क्षेत्र के बिसाऊ ठिकाने में रक्षक रहे अब्दुल खां के सैनिक बेटे नजर मोहम्मद से ब्याही गईं बिस्मिल्लाह के 8 बेटे और 2 बेटियां हुईं. सबसे बड़ी संतान इलियास अली—जिनकी उम्र अब 80 साल है—विकलांग होने की वजह से सेना में न जा सके पर उन्होंने अपने बेटे अली हसन को सेना में भर्ती करवाकर जैसे इसकी भरपाई की. 29 वर्षीय हसन अभी कपूरथला (पंजाब) में तैनात हैं. इलियास के बाकी सातों भाई सेना में रहकर रिटायर हुए हैं. गौस मोहम्मद (74), मकसूद खां (71), लियाकत (67), शौकत (64), सद्दीक (62), फारूख (60) और इंतजार (58).

अब इनकी पीढिय़ां देखिए: अभी ट्रेनिंग करके आया इमरान मकसूद का ही पोता है. उसके पिता इमदाद तो फौज में हैं ही. लियाकत का बेटा शफीक 10 आर्म्ड पठानकोट में है और. शौकत का 26 वर्षीय बेटा अयाज अभी 21 ग्रेनेडियर के रूप में चीन सीमा पर है. सद्दीक के इकलौते 35 वर्षीय बेटे सलीम की तैनाती अहमदाबाद में है. फारूख के दो में से एक बेटे वासिद की अभी जबलपुर में ट्रेनिंग चल रही है. इंतजार के तीन में से दो बेटे सलीम और जुल्फिकार फौज में ही हिसार में पोस्टेड हैं. तीसरा बेटा भी तैयारियों मे जुटा है. इस परिवार की पांच पीढिय़ों में लगभग डेढ़ दर्जन फौजी हैं.

बिस्मिल्लाह की दो बेटियों में से एक फौजी को ब्याही है. सद्दीक 1971 में पाकिस्तान से हुई लड़ाई का एक किस्सा सुनाकर बाकी परिजनों के बीच जोश भर देते हैं: ”हमें पाकिस्तान में 100 किमी अंदर घुसने का टास्क मिला. 100 फौजियों की टीम ने तीन दिन पैदल चलने के बाद चौथी सुबह चार बजे पाकिस्तानी सेना पर धावा बोल दिया. 30-35 सैनिकों को तो मौके पर ही मार गिराया, बाकी भाग गए. छातरों नाम की इस जगह पर हमारा कब्जा हो गया.

” सद्दीक उस वक्त हवलदार के पद पर थे. इस पर पूरक के तौर पर दूसरे बेटे गौस मोहम्मद भी अपना किस्सा जोड़ते हैं: ”हमें कश्मीर के पुंछ जिले में भेजा गया था. रात गहराने पर पाकिस्तान ने एकाएक हमला कर दिया. पर हम मुस्तैद थे और हमले को नाकाम कर उन्हें वापस खदेड़ दिया. ” ये चर्चाएं उस वक्त परवान चढ़ती हैं जब परिवार में शादी-ब्याह या कोई उत्सव हो. किस्से सुनकर यहां की महिलाएं भी बच्चों को सेना में जाने से रोकती नहीं हैं.

बिस्मिल्लाह के पांच बेटों ने 1971 की लड़ाई में शिरकत की थी. सद्दीक खां को छोड़ बाकियों को तो पाकिस्तान के साथ 1965 की लड़ाई का भी अनुभव था. 1971 की लड़ाई में थोड़ी देर के लिए तो बिस्मिल्लाह पर भी ममता हावी हो गई थी. खैर-खबर के लिए रेडियो ही एक माध्यम था. नजर को उसी पर कान लगाए रखना पड़ता. उनके पांचों बेटे तो सकुशल लौट आए पर इसी गांव के सैनिक शंकर धाबाई शहीद हो गए. बिस्मिल्लाह आज भी भावुक हो उठती हैं, ”एक बेटे की मुसीबत देखकर कोई भी मां घबरा उठती है, मेरे तो पांच बेटे दुश्मन के निशाने पर थे. ”

नुआं को फौजी गांव भी कह सकते हैं. 15,000 की आबादी वाले गांव में 90 फीसदी घरों में फौजी हैं. इसी गांव के ताज मोहम्मद खां प्रदेश के कायमखानी समाज के पहले सेना कैप्टन थे. उन्हें ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंपायर (ओबीई) अवार्ड मिला. इस अवार्ड में पांच पीढिय़ों को पेंशन मिलती है. इस गांव के कैप्टन अयूब खां को वीरचक्र मिला था और वे केंद्र में मंत्री भी रहे. वे आजादी के बाद प्रदेश से चुने जाने वाले पहले मुस्लिम सांसद भी हैं.

हाल ही राज्य वक्फ  बोर्ड के चेयरमैन बने और कायमखानी समाज के पहले पुलिस आइजी लियाकत अली खां इसी गांव की शान हैं. कायमखानी समाज (युवा) प्रदेश अध्यक्ष और झुंझुनूं से बीजेपी के युवा नेता जाकिर झुंझुंनूंवाला बताते हैं, ”यहां सेना में जाना महज नौकरी नहीं, एक परंपरा और परिवार के लिए रुतबा की बात है. ” सुबह-शाम सर्द मौसम में नंगे बदन सड़क पर दौड़ते  युवाओं को देखें तो लगता है कि इस गांव के परिवारों का ही नहीं बल्कि गांव का रुतबा भी कायम रहेगा और फौज परंपरा आने वाली पीढिय़ों तक चलेगी.


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें