नई दिल्‍ली। उनके हाथों में खुदा ने जिंदगी के रंग बख्‍शे थे। हुनर एक पेंटर का दिया था, लेकिन खुदावंद के इस तोहफे को उन्‍होंने एक माकूल और मुकम्‍मल चित्रकार बनकर उन्‍हें दोबारा लौटा दिया। उनकी कूची जिंदगी को उसके बुनियादी मायनों और मालूमातो से अलग खोजती रही। तस्‍वीर जो बनती रही वह उनके अंदर मौजूद रंगों का दरिया था। वे उन्‍हीं रंगों में फकीरी उंडलेते रहे और दुनिया को उसके ही चेहरे बनाकर दिखाते रहे, असली रंगों से दीदार कराते रहे।

मकबूल साहब यानी की मकबूल फिदा हुसैन के लिए जिंदगी किसी सफर से कम नहीं थी और उनका सफर एक आवारगी से कम नहीं था। मध्‍य प्रदेश के इंदौर की मिट्टी ने उन्‍हें रचाया-बसाया। इंदौर ने रंगों की दुनिया दी, तो मुंबई ने दुनिया के अजीबो-गरीब रंग दिखाए। लेकिन नसीब ऐसा था कि आखिरी वक्‍त इस मुल्‍क की दो गज जमीन और मिट्टी भी नसीब नहीं हुई। अपनों ने ही पराया कर दिया और दुनिया ने अपना लिया। एक सितारा जो चमका वतन में, लेकिन आफताब बन डूब गया मुल्‍क से बाहर।

जिंदगी का सफर और रंगों के पड़ाव  : 17 सितंबर 1915 को मध्‍य प्रदेश के इंदौर में जन्‍में मकबूल फिदा हुसैन की शुरुआती शिक्षा इंदौर में ही हुई। बहुत ही कम लोग जानते हैं कि मकबूल साहब का जन्‍म इंदौर में ही हुआ था, लेकिन वे अपनी मां को बहुत चाहते थे और मां उनकी महाराष्‍ट्र के पंढरपुर की थी, लिहाजा मां की याद को उन्‍होंने अपने ननिहाल से जोड़ने के लिए सभी को यही बताया कि उनका जन्‍म महाराष्‍ट्र के पंढरपुर में हुआ था। इसका जिक्र उन्‍होंने अपनी डायरी में भी किया है। डायरी आप हुसैन साहब के परिवार के बेहद करीबी, भोपाल के चित्रकार अखिलेश के घर देख सकते हैं।

बहरहाल, हुसैन साहब का रंगों से वास्‍ता और उनसे प्‍यार की तबीयत बचपन से ही रही। महज 20 साल की उम्र में वे मुंबई पहुंचे और वहां उन्‍होंने फिल्‍मों के पोस्‍टर बनाकर जिंदगी में रंगों को भरना शुरू किया। यहीं जेजे स्‍कूल ऑफ आर्ट से पोस्‍टर बनाते हुए उन्‍होंने मुंबई के कला जगत में अपनी हिस्‍सेदारी लेना शुरू की। लेकिन जिंदगी हुसैन के लिए कभी इतनी आसान नहीं रही, जितनी उनके परिचय के साथ लिखी जाती रही। फिल्‍मों के पोस्‍टर और होर्डिंग बनाने के उन्‍हें बहुत ही कम पैसे मिलते थे। यही वजह थी कि वे खिलौने की फ़ैक्टरी में भी काम करते रहे। हालांकि उन्‍होंने जब अपनी पहली पैन्टिग दिखाई तो मानों सफलता और प्रसिद्धी उनके इंतजार में ही बैठी थी। अपनी शुरुआती प्रदर्शनियों के बाद वे  प्रसिद्धि की सीढ़ि‍यां  चढ़ते गए।

एक सितारा जो आफताब बनने निकल पड़ा : हुसैन साहब की पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1940 के दशक के आख़िर में हुई जब साल 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए। युवा पेंटर के रूप में मक़बूल फ़िदा हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे। वे इसके लिए लगातार प्रयास करते रहे। यही वजह रही कि उन्होंने रामायण, गीता, महाभारत के पात्रों, घटनाओं और चरित्रों का अपनी पेंटिंग में सबसे खूबसूरती के साथ इस्‍तेमाल किया। यह पेंटिंग एक तरह से जीवंत पेंटिंग थीं। हुसैन साहब को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहचान 1952 में ज्युरिख में मिली जब उनकी पहली एकल प्रदर्शनी लगी। यही नहीं उसके कुछ ही सालों बाद उनकी फ़िल्म ‘थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर’ 1966 में फ्रांस के फ़िल्म समारोह में पुरस्कृत हुई।

मरते दम तक दौलत और शौहरत पैरो में रही:  कभी चंद पैसों के लिए इंदौर की गलियों में दुकानों के बोर्ड पर रंगों से नाम लिखने वाले, तो कभी मुंबई में फिल्‍मों के होर्डिंग बनाने वाले हुसैन पर शौहरत जब आई तो मानों दौलत के अकूत खजाने भी साथ ले आई। कहा जाता है कि हुसैन पर सरस्‍वती और लक्ष्‍मी दोनों की कृपा हो गई। यही वजह रही कि हुसैन ने भारतीय पेंटिंग कला की कई परंपराओं को तोड़ा बल्कि नई शैली को भी शुरू किया। हुसैन पर जब पैसा मेहरबान हुआ तो मरते दम तक उसकी मेहरबानी कम नहीं हुई। वे भारत के सबसे महंगे पेंटर रहे।

भारत क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमेरिकी डॉलर में बिकी। इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे चित्रकार बन गए। उनकी एक कलाकृति क्रिस्टीज की नीलामी में 20 लाख डॉलर में और ‘बैटल ऑफ गंगा एंड यमुना- महाभारत 12’ वर्ष 2008 में एक नीलामी में 16 लाख डॉलर में बिकी। यह साउथ एशियन मॉडर्न एंड कंटेम्परेरी आर्ट की बिक्री में एक नया रिकॉर्ड था। हालांकि एमएफ़ हुसैन अपनी चित्रकारी के लिए जाने जाते रहे।

रंग जो कूची से निकलकर फिल्‍म बन कैमरे में उतर गए  : हुसैन साहब चित्रकार होने के साथ-साथ फ़िल्मकार भी रहे। मीनाक्षी, गजगामिनी जैसी कई फ़िल्में उन्‍होंने बनाईं। यही नहीं उनका अभिनेत्री माधुरी दीक्षित से प्रेम भी ख़ासा चर्चा में रहा। मुग़ल-ए-आज़म के निर्देशक के. आसिफ़ साहब ने युद्ध के दृश्य फ़िल्माने से पहले युद्ध और उसके कोस्ट्यूम वगैरह के स्केच हुसैन साहब से ही बनवाए। जब आसिफ साहब ने ‘लव एंड गॉड’ बनाई तो आसिफ़ साहब ने ‘स्वर्ग’ के स्केच भी उन्हीं से बनवाए। 1998 में हुसैन साहब ने हैदराबाद में ‘सिनेमाघर’ नामक संग्रहालय की स्थापना की। हुसैन ने कुछ डाक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनाईं। तब्बू और कुणाल कपूर स्टारर मीनाक्षी उनकी अंतिम फ़िल्म थी।

विवाद बनाम हुसैन और आखिरी वक्‍त : विवाद हुसैन साहब के साथ ता उम्र चलते रहे। जैसे-जैसे उनकी शौहरत बुलंदियों को छूती रही, विवाद उनके पीछे चलना शुरू करने लगे। विवादों का यह सिलसिला शुरू हुआ वर्ष 1996 से, जब हिंदू देवी-देवताओं की उनकी चित्रकारी को लेकर काफ़ी विवाद हुआ। कई कट्टरपंथी संगठनों ने उनके प्रति नाराजगी जाहिर की और उनके घर पर तोड़-फोड़ भी की।

इसके बाद फ़रवरी 2006 में हुसैन पर हिंदू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरों को लेकर लोगों की भावनाएं भड़काने का आरोप भी लगा और हुसैन के ख़िलाफ़ इस संबंध में कई मामले चले। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि आपकी चित्रकारी को लेकर हमेशा विवाद होता रहा है, ऐसा क्यों ? उनका जवाब था ‘ये मॉर्डन आर्ट है। इसे समझने में देर लगती है। फिर जम्‍हूरियत है। सबको हक़ है। ये तो कहीं भी होता है। हर ज़माने के अंदर हुआ है। जब भी नई चीज़ होती है। उसे समझने वाले कम होते हैं।’ एक और विवाद तब उठ खड़ा हुआ जब जनवरी 2010 में उन्हें क़तर ने नागरिकता देने की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था। उनके इस कदम का आलम यह हुआ कि वे दोबारा चाहकर भी भारत लौट नहीं पाए।

9 जून 2011 को उनका इंतकाल हो गया और उन्‍हें हिंदुस्‍तान की दो गज मिट्टी भी नसीब नहीं हुई। उन्‍हें लंदन में दफनाया गया। भारत का पिकासो कहा जाने वाला यह शख्‍स अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में अपने मुल्‍क को याद करता रहा, लेकिन लौटना उसके नसीब में नहीं था। रंगों में जी गई जिंदगी आखिरी दौर में सूनी, सपाट और रंगहीन ही रही। बहादुर शाह जफर के उस शेर की तरह, जहां जिंदगी के आखिरी समय में सन्‍नाटे रंगहीन होकर शोर मचाते हैं।

कितना है बदनसीब ‘जफर’ दफ्न के लिए

दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।

साभार : आई बी सेवन

LONDON: 92-year-old Indian artist Maqbool Fida Husain speaks as Indian Bollywood star actor Shah Rukh Khan (not pictured) paints June 7, 2007 at Bonhams' "Art For Freedom", in London. The highlight of the evening occurred when the two artists finished off a painting which then went on to be auctioned to raise funds for Tehelka, a media house in India, and the country's fastest-growing English weekly newspaper. AFP PHOTO/EDMOND TERAKOPIAN (Photo credit should read EDMOND TERAKOPIAN/AFP/Getty Images)


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