1 सितंबर 1965 को पाकिस्तान ने पहले से चल रहे ऑपरेशन जिब्राल्टर के साथ ग्रैंड स्लैम शुरू किया। इसके तहत पाकिस्तान ने अखनूर और जम्मू हमले करना शुरू कर दिए। उसकी प्लानिंग भारतीय सेना की रसद लाइन काटने की थी। इसका कड़ा उत्तर भारतीय एयरफोर्स ने हवाई हमले कर दिया। भारत के हवाई हमलों को नाकाम करने के लिए पाकिस्तान की एयरफोर्स ने श्रीनगर के हवाई ठिकानों पर हमले किए। भारतीय सेना ने इसका करारा जवाब दिया। इसी बीच भारत ने बड़ा फैसला लिया। इस फैसले को इस युद्ध के इतिहास मे अहम माना जाता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करते हुए पश्चिमी मोर्चे पर हमला किया।
मेजर जनरल प्रसाद ने की एलओसी की पार
द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेतृत्व मे भारतीय फौज ने इच्छोगिल नहर को पार पाकिस्तान में घुस गई। यह नहर भारत-पाक की वास्तविक सीमा थी। भारत के पश्चिमी कमान के सेना प्रमुख ने तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी को भारत-पाक पंजाब सीमा पर एक नया फ्रंट.खोलने का प्रस्ताव दिया। सेनाध्यक्ष ने इसे तुरंत खारिज कर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री.को यह बात जम गई। उन्होंने सेनाध्यक्ष के फैसले को काटते हुए इस हमले का आदेश दे दिया। तेजी से आक्रमण करती हुई भारतीय थल सेना लाहौर की ओर से बढ़ गई। उसने लाहौर हवाई अड्डे के नजदीक डेरा डाल लिया। इस हवाई अड्डे सहित लाहौर के कई इलाकों पर कब्जा करते हुए तिरंगा लहरा दिया।
फाइल फोटो- पाकिस्तान के लाहौर के बर्की थाने के सामने खड़े लेफ्टीनेट कर्नल हरिसिंह एवं एक अन्य कर्नल।
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अमेरिका को करनी पड़ी युद्ध रोकने की अपील
पाकिस्तान के लाहौर पर भारत के कब्जे की जानकारी जब अमेरिका को मिली तो वह दंग रह गया। उसने भारतीय सेना से कुछ समय के लिए युद्ध विराम करने की अपील की। इसका कारण वह अपने नागरीको को लाहौर से निकाल सके। भारत ने अमेरिका की बात मान ली। अमेरिका ने अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने का काम शुरू कर दिया। इसी बीच पाकिस्तान ने लाहौर पर दबाव कम करने के लिए भारत के खेमकरण पर हमला कर दिया। उसका मकसद भारतीय फौज का लाहौर से ध्यान भटकाना था। बदले मे भारत ने भी बेदिया और उसके आसपास के गांँवो पर हमला कर कब्जे मे ले तिरंगा लहरा दिया।
फाइल फोटो- एलओसी, इच्छोगिल नहर पार कर पाकिस्तानी सीमा में घुसते भारतीय सैनिक।
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