गाय भारत में सिर्फ़, तीन राज्यों को छोड़कर, पूरे देश में गोहत्या पर दशकों से प्रतिबंध रहा है।
मगर इस मुद्दे को लेकर हमेशा राजनीति गरमाई रही और राजनीतिक दलों पर इसे भुनाकर चुनावी लाभ लेने का आरोप लगता रहा है।
एक तरफ, दक्षिणपंथी संगठन विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में गोहत्या रोकने को चुनावी मुद्दा बनाकर वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करते रहे, वहीं दूसरी तरफ उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे संगठन इस मुद्दे को लेकर अल्पसंख्यकों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कराने की कोशिश करते रहे।

बैल
यह सबकुछ इसके बावजूद है, जब ‘बीफ’ के नाम पर भैंस के मांस का कारोबार ही होता रहा है।
अलबत्ता बैल और बछड़े का मांस कुछ राज्यों में बिकता रहा है, जिस पर भी अब प्रतिबंध लगा दिया गया है।
इसका मतलब यह है कि भारत में अब बैल और बछड़े के मांस पर प्रतिबंध को लेकर राजनीति हो रही है।
‘बीफ’ का जहां तक सवाल है तो अलग-अलग देशों में इसको अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया है।
जहाँ अमरीका में सिर्फ गोमांस को ही बीफ की श्रेणी में रखा गया है, वहीँ भारत में भैंस के मांस को भी इसी श्रेणी में रखा गया है।
हालांकि पिछले एक-दो साल से इसका निर्यात ‘बफैलो मीट’ कह कर ही किया जाता है।

सबसे पहले प्रतिबंध कश्मीर
देश के मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर में वर्ष 1935 से ही गोहत्या पर प्रतिबंध रहा है।
इस राज्य में ‘रणबीर पैनल कोड’ ‘के तहत 1935 में जो कानून बनाया गया उसके अनुसार, गोहत्या पर दस साल की कैद के अलावा आर्थिक दंड का भी प्रावधान है।
घाटी के वरिष्ठ पत्रकार शेख कय्यूम कहते हैं कि इस मुद्दे पर बहस बेमानी है।
कय्यूम कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में तो आजादी से पहले से ही गोहत्या पर प्रतिबंध चलता आ रहा है और किसी को इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है। इस पर अब कोई बहस नहीं होनी चाहिए क्योंकि यहाँ पूरा प्रतिबंध है।”
वहीँ, जम्मू-कश्मीर के एक दूसरे राजनीतिक विश्लेषक परवेज मजीद का मानना है कि इस कानून का उल्लंघन नहीं होना चाहिए क्योंकि यह मुद्दा लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है।
कश्मीर घाटी के लोग इस कानून के साथ जी रहे हैं और आपस में मिलजुल कर, एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए जी रहे हैं।
मजीद कहते हैं कि इस मुद्दे को लेकर अगर राजनीति होती है तो यह इस इलाके के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए उछालने से माहौल खराब हो सकता है, क्योंकि राजनीति और धर्म को लेकर राज्य में हालात पिछले कुछ वर्षों से नाजुक रहे हैं।

‘कानून जरूरी था’ गाय
गो-वंश संरक्षण के लिए काम करने वाले हिन्दू जनजागृति समिति के रमेश शिंदे भी मानते हैं कि ‘आधिकारिक तौर’ पर तो गोहत्या पर प्रतिबंध रहा है, लेकिन इन कानूनों में सजा के प्रावधान कम थे, इसलिए विभिन्न राज्यों में नए कानून लाए गए हैं।
शिंदे मानते हैं कि इस मामले पर राजनीति होती रही है।
शिंदे कहते हैं कि इस पर किसी तरह का विरोध समझ में नहीं आता। कुछ राजनेता इस प्रतिबंध की दुहाई देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं और लेते भी रहे हैं। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि आजाद भारत में अगर पहला कानून बने तो वो गोहत्या के खिलाफ बने। इस मुद्दे को धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
शिंदे चाहे जो कहें मगर इस मुद्दे को हमेशा धर्म से ही जोड़कर देखा जाता रहा है और गोहत्या के आरोपों ने कई बार कानून व्यवस्था का बड़ा सवाल खड़ा किया है।
15 अक्टूबर 2002 को हरियाणा के झज्जर गाँव में गोहत्या के आरोपों के बाद भड़की हिंसा में पांच दलितों की ह्त्या हो गई थी।
इस घटना के विरोध में कई दलितों ने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया था।

ध्रुवीकरण असदुद्दीन ओवैसी
आॅल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि इस मुद्दे के बहाने भारतीय जनता पार्टी ऊंची जाति के हिन्दुओं का अपनी ओर ध्रुवीकरण कर रही है, जिससे उसे अपने ‘हिंदुत्व’ के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है।
ओवैसी कहते हैं, “भारतीय जनता पार्टी अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर चल रही है और 2024 में जब आरएसएस अपने सौ साल पूरे करेगी, तबतक भारत को हिन्दू राष्ट्र बना देने की कोशिश चल रही है। मैं सरकार को चुनौती देता हूँ कि वो भैंस के मांस के कारोबार पर भी प्रतिबंध लगाकर दिखाए।”
उनका कहना है कि ‘बीफ’ पर प्रतिबंध का असर आर्थिक रूप से कमजोर मुसलमान और दलितों पर ही पड़ेगा।

लाखों गरीब दलितों का खाना बीफ
इस मुद्दे पर देश के विभिन्न हिस्सों में ‘बीफ फैस्टिवल’ आयोजित करने वाले आदिवासी दलित छात्र संघ के मोहन धरावत का अलग तर्क है।
वो ‘बीफ’ पर लगे प्रतिबंध को ‘खाने का फासिज्म’ मानते हैं। उनका कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां लोगों को अपनी पसंद का खाने की आजादी होनी चाहिए।
वो कहते हैं कि मैं क्या खाऊं ये मैं तय करूंगा, सरकार नहीं। आप नहीं खाना चाहते, आप मत खाइए। मगर आप मुझे मेरी पसंद का खाने से नहीं रोक सकते। लाखों गरीब दलितों और आदिवासियों के लिए ‘बीफ’ सबसे सस्ता ‘प्रोटीन’ है।
धरावत कहते हैं कि गरीब आदिवासी और दलित इतनी आर्थिक हैसियत नहीं रखते कि मटन, फल और मेवे खा सकें। इनके लिये सबसे ज्यादा पौष्टिकता सस्ते ‘बीफ’ में ही थी।
मुगल बादशाह बाबर, बहादुर शाह जफर और मैसूर के सुल्तान टीपू सुल्तान के दौर में भी गोहत्या पर प्रतिबंध रहा है।
आज इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दल समुदायों के ध्रुवीकरण की कोशिश में जुटे हैं। यह सब बावजूद इसके है कि भारत पूरे विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मांस का निर्यातक है।
सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली


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