“हम बता नहीं सकते कि हम पर क्या बीतती है, हमने क़ानून को हर चीज़ मुहैया कराई है. मगर क़ानून अंधा, बहरा हो गया है.”

हाशिमपुरा मामले के एक पीड़ित मोहम्मद नईम की तकलीफ़ का उनकी इन्हीं बातों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

इस मामले पर कोर्ट के फ़ैसले ने जितने सवालों के जवाब नहीं दिए, उससे ज़्यादा सवाल खुले छोड़ दिए.

एक फेहरिस्त है इन सवालों की.

1. 42 लोगों की हत्या की वजह बनीं थ्रीनॉटथ्री राइफ़ल की गोलियों के बही-खाते का क्या हुआ?

2. हाशिमपुरा मोहल्ले में चलाए गए सर्च ऑपरेशन में आर्मी क्या कर रही थी?

3. उत्तर प्रदेश के रिज़र्व पुलिस बल पीएसी की भूमिका तो नरसंहार में एकदम साफ़ थी पर उसने किसके फ़ैसले से इसे अंजाम दिया. जिम्मेदारी किसकी बनती है?

4. मामले की जांच करने वाली एजेंसी की क्या मजबूरियां रही होंगी कि वे सबूत सामने लाए ही नहीं गए जिनसे मामला साबित हो पाता?

5. पीड़ितों के लिए आगे क्या विकल्प हैं?

अपील का रास्ता

पीड़ितों की तरफ से मामले की पैरवी करने वाली वकील रेबेका जॉन कहती हैं, “अपील में जाना है पर अपील में कोई नया सबूत नहीं लाया जा सकता. जो सबूत हैं, उन्हीं के आधार पर हम अपील करेंगे कि क़ानून के नजरिये से ये फ़ैसला गलत है.”

हालाँकि सबूत जुटाना जांच एजेंसी की जिम्मेदारी थी और उसकी तरफ से कई चूकें हुईं.

जिन पर मुकदमा चलाया जाना था, उन्हें घटना के कई साल बाद गिरफ़्तार किया गया. साथ ही किस आधार पर गिरफ़्तारियां हुई, इसकी भी कोई जानकारी रिकॉर्ड में नहीं है.

अभियुक्तों से क्या बरामद किया गया, ये भी पता नहीं चल पाया. नरसंहार को अंज़ाम देने में इस्तेमाल किए गए हथियारों से अभियुक्तों के संबंध के सवाल को भी अज्ञात वजहों से छोड़ दिया गया.

रेबेका जॉन कहती हैं, “अभियुक्त एक सुरक्षा एजेंसी से थे और वहां सरकारी हथियारों और गोलियों का पूरा हिसाब-किताब रखा जाता है कि कौन सा हथियार और कितनी गोलियां किसे दी गईं.”

जिम्मेदारी किसकी?

एडिशनल सेशन जज ने पीएसी को नरसंहार के लिए साफ़ तौर पर जिम्मेदार ठहराया है, भले ही उसके अफ़सर बरी हो गए हों.

जिम्मेदारी का सवाल इसलिए भी उठता है कि 42 लोगों की हत्या के लिए कोई तो जिम्मेदार होना चाहिए. यह क्यों नहीं तय हो पाया और जिन्होंने इसे अंजाम दिया था, उन्हें क्यों सज़ा नहीं दी जा सकी.

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह कहते हैं, “सरकार की दूसरी एजेंसियों ने अपना काम ठीक से किया होता तो जिम्मेदारी का सवाल अभी तक तय हो गया होता. राज्य सरकार, प्रदेश पुलिस, प्रदेश शासन, अभियोजन पक्ष, ज्यूडिशयरी, किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. इसी कारण लोग बरी हो गए. यह पूरी व्यवस्था की नाकामी है.”

दंगे और नरसंहार

भारत में दंगों और नरसंहारों का एक लंबा सिलसिला रहा है. 1984 के सिख विरोधी दंगे, हाशिमपुरा नरसंहार, 2002 के दंगे.

अभियुक्तों का बरी होना और क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी से बच जाना. कमोबेश हर मामले में नतीजे एक जैसे देखे गए.

तो क्या हाशिमपुरा का मामला भी यहीं पर खत्म हो जाता है. और अपील में जाने से क्या बदल जाएगा?

रेबेका जॉन कहती हैं, “मैं ये चाहती हूं कि एक ऊँची अदालत मामले पर विचार करे. वह जिम्मेदारी तय करे. मेरे लिए यही न्याय होगा. ताकि कल ये दोबारा न हो.”

इस मामले के पीड़ित मोहम्मद नईम के शब्दों में, “पांच गवाह पहाड़ से खड़े थे, जिन्हें गोली लगी थी. हमने वो गाड़ी मुहैया कराके दी जिस पर हमें ले जाया गया था, उस पर खून के छींटे दिखाए. वो राइफ़लें बरामद हुईं. हम और कितने सबूत दें, ये तो हमारा काम नहीं है कि हम मुलज़िम की तलाश करें. ये तो सरकार का काम है.”

खबर साभार – bbc हिंदी 


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें