सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
भारत, मुसलमान, सांप्रदायिक हिंसा, पीड़ित 1987 में मेरठ के मुस्लिम बहुल हाशिमपुरा इलाके में 40 से ज्यादा लोगों की हत्या के अभियुक्त उत्तर प्रदेश की प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी के 16 जवानों को दिल्ली की एक निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है।
अदालत ने ये फैसला 21 मार्च को दिया था। अदालत के फैसले से घटना के गवाह और पीड़ित परिवार निराश हैं। लेकिन उन्हें भरोसा है कि ऊपरी अदालत में उन्हें इंसाफ मिलेगा।
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने घटना के पीड़ित मोहम्मद उस्मान से बात की जिन्हें दो गोलियां लगी थीं।

उस्मान की आपबीती

हम घर पर थे। हमारे वालिद साहब भी बैठे थे। वो तलाशी के बहाने से आए और हमें घर से बाहर निकाला। हमारे हाथ ऊपर उठवाकर वो फिर हमें सड़क पर ले गए।
सड़क पर लाकर हमें पीएसी के हवाले कर दिया गया। हमने देखा कि वहां बहुत सारे लोग पहले से बैठे हुए थे। यह दोपहर के करीब तीन-चार बजे का वक़्त रहा होगा।
शाम के वक़्त सब को ट्रकों में भर भर के सिविल लाइन्स थाने भेजा गया। फिर उसके बाद पचास के करीब मर्दों को छांट कर अलग किया गया।
औरतों और बच्चों को एक तरफ कर दिया गया। औरतों और बच्चों को छोड़ने को कह दिया था और हमें छांट कर एक तरफ खड़ा कर दिया गया।

पीएसी वाले

भारत, उत्तर प्रदेश, पुलिस, (फाइल फोटो)
पीएसी का एक ट्रक मंगवाया गया। मगरिब (सूरज ढलने के बाद) के बाद हमें ट्रक में चढ़ाया। हमें नीचे बैठाया गया जबकि पीएसी के जवान खड़े हुए थे। हमें वो ट्रक पर लाद कर चल दिए। हमें पता नहीं चल पा रहा था कि ट्रक कहाँ जा रहा था। जब ट्रक ने पुल पार किया तब पता चला कि यह मुरादनगर की गंग-नहर है। पुल पार करके ट्रक को आगे की तरफ बढ़ाया। पीछे से एक और गाड़ी आ रही थी। उसे पास दिया गया। फिर जिस ट्रक पर हमें लादा हुआ था उसे एक पेड़ के नीचे रोका। फिर पीएसी वाले नीचे उतरे। पहले उन्होंने हम में से एक को नीचे उतारा और उसे गोली मार दी। फिर और गोलियां चलानी शुरू कर दीं।

पहली गोली
हमने सोचा कि अब ये सबको मार देंगे। तब आपस में हमने कहा कि खड़े हो जाओ और ट्रक से कूद जाओ वर्ना ये सबको मार देंगे। सब ट्रक में खड़े हो गए तो उन्होंने ट्रक पर गोली चला दी। गोलियां कई लोगों को चीरती हुई पार हो गईं। मगर मैं बच गया था। मुझे ट्रक के ऊपर से उतारा गया। एक पीएसी वाले ने मुझे उतारा। दो ने मुझे पकड़ा और तीसरे ने मुझे गोली मारी। पहली गोली मेरे पेट के आगे लगी और पीछे की तरफ से निकल गई। हाय अल्लाह, मैं मर गया कहते हुए नीचे गिर गया। तब उन्होंने कहा इसे पानी में फेंक दो। फिर एक ने हाथ पकड़े, एक ने पैर पकड़े और मुझे नहर में फेंक दिया।

सब खामोश!

नहर में फेंकते वक़्त भी गोली चलाई। गोली मेरी टांग पर लगी। मैंने तैरने की कोशिश की मगर मुझ से तैरा नहीं गया। किसी तरह पानी के बहाव के साथ बहता गया।  कुछ दूर पानी को काटते हुए मैंने किनारे की एक झाड़ी को पकड़ लिया। मगर गोलियों की आवाजें आती रहीं। जिन लोगों को वो पानी में फेंक रहे थे उनकी भी आवाजें आ रहीं थीं। ऐसा लग रहा था मानो पानी में कोई ईंट फेंक रहा हो। जब वहां सन्नाटा पसर गया तो मैं पेट के बल ऊपर किनारे पर चढ़ा। मैंने देखा वहां मेरे पहचान के बाबुद्दीन और मुजीबुर रहमान भी पड़े हुए थे। फिर हमने वहां दो साथियों को और देखा जो हमारे साथ ट्रक में थे। हम वहां पड़े थे इस उम्मीद में कि आस पास के गाँव का कोई शायद आए और हमें ले जाए।

पुलिस ने बचाया
मगर फिर एक रोशनी नजर आई। यह मोटरसाईकल थी जिस पर एक दरोगा सवार था। दरोगा के पीछे एक और आदमी बैठा हुआ था। उन्होंने मेरे पास गाड़ी रोकी और कहा, “क्या है बे?” मैंने उन्हें बताया कि हमें पीएसी वालों ने गोली मारकर फेंक दिया है। फिर अपने पीछे बैठे आदमी को मेरे पास छोड़कर दरोगा ने कहा कि बेटे मैं गाड़ी लेकर आ रहा हूँ। फिर वो गाड़ी लेकर आया और मेरे साथ पड़े दो लोगों को गाड़ी में डाला जो बेहोश थे। मैं होश में था। फिर दरोगा ने मुझसे कहा कि बेटे मैं तुम्हें अस्पताल ले जा रहा हूँ।
लेकिन उन्होंने कहा कि मैं पीएसी का नाम न लूँ वर्ना हमें जहर का इंजेक्शन लगा दिया जाएगा। मुझसे कहा गया कि मैं कहूँ कि मुझे बलवे में गोली लगी और पुलिस ने मुझे बचाया। बाद में मुझे आॅल इंडिया इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया। हम 28 सालों तक इंसाफ मिलने की उम्मीद के सहारे जीते रहे। अब ऊपरी अदालतें हैं। हमें अब भी इंसाफ की की उम्मीद है।


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