शिफा और  बिमारी अल्लाह ही की तरफ से है। अल्लाह ने कुदरत में ही बिमारी और शिफा रखी है। पहले हाकिम हुआ करते थे,जड़ी बूटियों के जरिये से इलाज कर दिया जाता था व साथ में दुआओं का भी एहतमाम होता था। खैर वक्त के साथ इलाज और बीमारियां भी अपना चेहरा बदलने लगे। खाने में लज्जत के लिए मुख्तलिफ किस्म के मसालों की ईजाद की गयी..अब तो फास्ट फूड का जमाना आ गया। स्पायसी  मसालेदार खाने के आदि लोग होने लगे। पहले लोग भूके होते लेकिन अंदर  इमानि कूवत उतनीही ज्यादा होती थी। खुदा का खौफ भी हर लम्हा होता था।
वक्त के साथ  जीने काअंदाज भी इंसान ने बदल लिया। हराम हलाल का  कुछ लिहाज न रहा। एक जेहनियत इंसान की ये बनती गयी के ईमानदारी से इंसान झोपडी में ही रहता है। कार, बंगला होटलों में खाना, बाजारों में घूमना…अब इंसान लाइफ को एन्जॉय करना चाहता है उसे किसी की परवाह नहीं…आखिरत बहोत पीछे छोड़ आया…..खुदा का खौफ  कब का दिल से निकल गया…..सिर्फ ‘‘ मै और  मेरी जिन्दगी…..‘‘
रोजमर्रा की जिन्दगियों में हम चाह कर या न चाह कर भी डॉक्टर का दखल होता ही है। इंसान फरिश्ता या जिन्न नहीं जो बिमारी से दोचार नहीं होता। बच्चे बूढ़े जवान मर्द औरत..सभी को किसी न किसी जगह पर डॉक्टर की मदद या इलाज की जरूरत पड़ती ही है। मआशरे में एक और तकसीम है आमिर और गरीब की..!आमिर तो खैर जैसे तैसे फिर भी गुजारा कर लेता है.. लेकिन इस दौर में गरीबी सिवाय एक बद्दुआ के कुछ नहीं ऐसा लगता है…पहले ही मुश्किल से गुजारा करता रहता है..कही खुदा नाखास्ता  अगर इसमें बिमारी का दखल आ गया तो फिर इसके लिए जीना मुश्किल हो जाता है वह बेहाल हो जाता है…समझ में नहीं आता के कहा जाय…किसको अपनी परेशानी बताय….जनाब डॉक्टर साहब तो आज कल बेरहम हो कर बैठे है…हर जगह पर कमीशन के आदि हो चुके है…यहाँ तक के मेडिकल शॉप में भी अपना हिस्सा रख चुके है। इंसान कहा तक बर्दाश्त कर सकता है…सिर्फ खांसी भी आ रही तो ब्लड टेष्ट…एक्सरे….अगर कुछ और आगे जाना है तो…ईसीजी…अँजिओग्राफी….क्या क्या टेस्ट पता नहीं….??
जरूरत है तो कोई बात नहीं लेकिन पैसा कमाने का आसान तरीका एहि रह गया है .और डॉक्टर …अस्पताल ऐसी जगह है जहा पर इंसान बेबस हो जाता है। बाज वक्त तो ऐसी हालात होती है के अपने अजीजों की जान बचाने के लिए इन्तहा तक पहुँच जाता है…अपना घर बार जायदाद तक दांव पर लगा देता है…..आखिर में हाथ आती है…लाश….!! और उससे भी पहले अस्पताल का बिल…..जिसको अदा किये बगैर अपनों की लाश भी नहीं मिलती। कुछ लोग बड़े ही अफसोस के साथ अस्पताल का बिल अदा किये बगैर चले जाते है…और लाश भी वही छोड़ जाते है इसलिए के इनके पास पैसे नहीं होते…..सब कुछ इलाज में खर्च हो जाता है…..
ऐसा नहीं सभी डॉक्टर इसी तरह बेरहम होते है। कुछ होते.है, लेकिन अब आहिस्ता आहिस्ता इनकी तायदाद घटती जा रही है। पहले छोटे से क्लीनिक से शुरुआत होती है। शुरुआत में खिदमत का जज्बा भी होता है। पैसा कमाने में मजा भी आने लगता है। मोहोल्ले में लोग भरोसा भी करते है। पहले अजीजी होती है, लेकिन रुपये का नशा फिर सर चढ़ने लगता है। आहिस्ता आहिस्ता मोटर साइकिल कार में तब्दील हो जाती है। किराए का घर जाती आलिशान बंगले में तब्दील हो जाता है….पैसे का नशा घमंडी में बदल जाता है। मैं पैसे के बलबूते पर कुछ भी कर सकता हूँ। पेशंट को कुछ हुआ भी तो मैं मैनेज कर सकता हुँ और इसी के दरमियान एक जिन्दगी सिसक सिसक कर दम तोड़ देती है….घरों में मातम छा जाता है….इन्ही बेबस पेशंट के आँखों से बहनेवाले एक एक आंसुओं के बदले में डॉक्टर  साहब की घरों की दीवारों की ईंटे रखी जाती रहती है। खिदमत अब धंदा बन गया। जज्बात से खेलने का..खेल बन गया। एक पेशंट को निचोड़ निचोड़ कर मार दिया फिर अब एक और की तलाश इस्सलिये के एक और बंगले को तामीर करने के लिए पैसे की जरूरत पढ़ी है ……चलो एक और जान से खेलेंगे……दूसरों के मातम पर ही इमारतों की बुनियादी रखने हा फन इन्होने सिख लिया है……इन्हे किसी की पर्वा नहीं सिर्फ पैसा…पैसा …और पैसा …कमाना है…किसी भी कीमत पर ….
…   पुइंसंीउमक रंांजप,ठमसहंनउ


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