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बनारस: – काफी समय पहले एक फिल्म आई थी ‘वक़्त’ जिसमे एक बेहतरीन गाना था ‘वक़्त की हर शय गुलाम’, ‘वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता’ यह आदमी जितना जल्दी समझ लें बेहतर है। आम आदमी इस वक़्त को ही कोस- कोस कर मर जाता है। लेकिन ये वक़्त किसी को नहीं अपने चंगुल में लेने से नहीं नहीं रुकता ‘चाहे वो राजा हो या रंक’ ऐसा ही कुछ देखने को मिला है बादशाह बाबर के खानदान के बारे में। बनारस में रह रहे बादशाह बाबर का खानदान शहर में आबाद तो हैं मगर इस कदर गुमनाम और तंगहाल में जी रहा हो कि मजदूरी करके ही अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहा हैं। गोविंदपुरा की एक छोटी सी गली में छोटी मस्जिद के पास एक तीन मंजिला मकान के एक छोटे से कमरे में हथौड़ी चलाकर चांदी के तारों को वर्क की शक्ल देने में जुटे बुजुर्ग मिर्जा आलमगीर हैं।

पुरखों ने कभी हिन्दुस्तान पर हुकूमत की मगर उनकी हुकूमत में विरासत में मिला यह मकान है। हुकूमत की नाराजगी से खुद की हिफाजत ही उनके पुरखों के दिल्ली छोड़कर बनारस आ बसने की वजह बनी। बकौल मिर्जा आलमगीर, शहजादे जहांदार शाह का अपने वालिद शहंशाह शाहआलम से किसी बात पर झगड़ा हो गया था और शाहआलम की नाराजगी के चलते जान जाने के अंदेशे में उन्होंने दिल्ली से लखनऊ होते हुए बनारस में आकर शरण ले ली। यह बात करीब 220 साल पुरानी है। मिर्जा आलमगीर बख्त जहांदार शाह के बाद की सातवीं पीढ़ी से हैं।

शाही खानदान का सदस्य होने के नाते उनके कुनबे को पहले बाकायदा पेंशन मिलती थी। उनके वालिद फरीदुद्दीन भी पेंशनयाफ्ता थे। यह मकान उन्हीं ने बनवाया था। मिर्जा आलमगीर ने पढ़ाई-लिखाई की नहीं और जब कुनबे की जिम्मेदारी सिर पर आ पड़ी तो समझ में न आया कि कहां से शुरू करें। उन्होंने मकान के कमरे किराए पर लगा दिए। बचपन में सीखा वर्क बनाने का हुनर काम आ गया। उन्होंने इसी काम को आजीविका बना लिया।

खबर साभार – हिंदी सियासत डॉट कॉम 


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