आपने उर्दू को पसंद करते हों या ना करते हों, आप शायरी को पसंद करते हों या ना करते हों, भले ही आपने किसी भी शायर को ना पढ़ा हो। लेकिन एक तराना हर एक हिन्दुस्तानी स्कूल के वक्त से ही जरूर गुनगुनाता है।

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसितां हमारा

ये तराना पूरे भारत का अघोषित कौमी तराना है। इस तराने को लिखने वाले सर डॉ. अल्लामा मुहम्मद इकबाल की आज जयंती है। नाम तो उनका मुहम्मद इकबाल ही है, लेकिन नाम के साथ खिताब जुडते गए और उनका नाम बड़ा होता चला गया। सर डॉ. अल्लामा मुहम्मद इकबाल।

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इकबाल 9 नवंबर 1877 को सियालकोट (अब पाकिस्तान) में पैदा हुए। इनके पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे, जिन्होंने तीन शताब्दी पूर्व इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और कश्मीर से पंजाब में आ बसे।
यूं तो गजल के मायने महबूब से बात करने के हैं, लेकिन इकबाल ने अपनी शायरी में सिर्फ महबूब से बात नहीं की। उन्होंने माशूका की जुल्फों पर शायरी नहीं की। बल्कि अंग्रेजों के राज में तड़प रहे भारत की आवाज उनकी शायरी में नजर आई, शूद्र का दर्द दिखा, औरतों की आवाज दिखी, उन्होंने लिखा।

तिरी निगाह में है मुअज्जिजात की दुनिया
मिरी निगाह में है हादसात की दुनिया

सुनता हूं कि काफिर नहीं हिन्दू को समझता’

अल्लामा इकबाल का बहुत कम उम्र से ही शायरी की तरफ झुकाव हो गया। स्कूल खत्म होने करने के बाद लाहौर पहुंचे तो प्रो. अर्नोल्ड जैसे कबिल तरीन दार्शनिक के साये में उनकी काबिलियत को नयी तरह से तराशा गया।

शायद दार्शनिक प्रो. अर्नोल्ड का ही असर जिसने उन्हें काफिर तक कहलवाया। दरअसल इकबाल को मुस्लिम रहनुमा और पाकिस्तान की मांग करने वाले शायर के तौर पर जाना जाता है। लेकिन उनके साथ ऐसा भी हुआ जब उन्हें मुस्लिम दक्षिणपंथियों ने काफिर तक कहा।

इकबाल से मुस्लिम कट्टरपंथी खुश नहीं थे। क्योंकि वो हिन्दू को काफिर (मुस्लिमों के अनुसार गैर मजहब का इंसान) कहना पसंद नहीं करते थे। इसलिए उनको निशाना करके एक शेर लिखा गया।

सुनता हूं कि काफिर नहीं हिन्दू को समझता
है ऐसा अकीदा असर-ए-फलसफा दानी
(हिन्दू को काफिर नहीं कहता, ये दर्शनशास्त्र का असर लगता है)

लेकिन इन सब हमलों के बावजूद इकबाल को हमेशा यही लगता रहा कि उनको मुस्लिम धर्मगुरु समझते ही नहीं हैं। उन्होंने इसका जवाब एक शेर से दिया।

जाहिद-ए-तंग नजर ने मुझे काफिर जाना
और काफिर ये समझता है मुसलमान हूं मैं
(जाहिद-विद्वान)

आह! शूद्र के लिए हिन्दोस्तां गम-खाना है’

भारत में मौजूद जाति व्यवस्था से भी इकबाल बेहद खफा थे। उनको सिर्फ एक जाति का वर्चस्व बेहद बुरा लगता था, उनकी शायरी मे इसकी झलक साफ दिखती है।

आह! शूद्र के लिए हिन्दोस्तां गम-खाना है
दर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है।

क्या Lalu को बधाई देने में शरमा रहे है मोदी ?

लेकिन इकबाल पश्चिमी सभ्यता के भी हक में नहीं थे। वो मानते थे, कि पश्चिम की सभ्यता हमारे लिए नहीं है। इसकी झलक उनकी शायरी में कुछ यूं मिलती है।

तुम्हारी तहजीब अपने खंजर से आप ही खुदकुशी करेगी
जो शाख-ए-गुल पे आशियाना बनेगा, ना-पाएदार होगा।

मुल्क की हालत से खफा होकर उन्होंने देश के बाशिंदो को अपनी शायरी से आगाह भी किया।

वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में,
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्तां वालो
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।

राम को इमाम कहने वाला शायर

इकबाल का रामचन्द्र जी पर लिखे शेर उनकी सोच को बताते हैं। उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथियों की फिक्र किए बना राम पर शेर कहे। उन्होंने लिखा।

हे राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज
अहले नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द

राम को इमाम कहने पर उनकी खूब आलोचना हुई लेकिन वो शायद आलोचना करने वालों से बहुत आगे सोचते थे। दरअसल वो धर्म को सिर्फ यूं हीं मान लेने को सही नहीं मानते थे। उन्होंने धर्म की परिभाषा एक शेर में दी। उन्होंने फारसी में शेर लिखा।

गुफ्त दीन-ए-आमियां? गुफ्तम शनीद
गुफ्त दीन-ए-आरिफां? गुफ्तम कि दीद
(आम लोगों का मजहब सुने-सुनाए पर यकीन करना है। जबकि ज्ञानियों का मजहब आंखों देखे पर विश्वास करना है)

वो किस्मत से ऊपर काम को रखने के हिमायती थे। इसकी झलक उनके इस शेर में मिलती है

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।

जब एक खातून के एतराज पर बदल गए इकबाल

अल्लामा इकबाल बेहद जहीन आदमी थे इसपर कोई शक नहीं, लेकिन इसके बावजूद अगर किसी से मुतास्सिर हुए तो उसको अहंकार का विषय नहीं बनाया। उन्होंने अपनी एक गजल में औरतों के लिए पर्दे की हिमायत की। ये बात औरतो की एक तरक्कीपसंद तंजीम को पसंद नहीं आई तो उनकी तरफ से इकबाल को खत आया।

खत में इकबाल से शिकायत की गई कि उनके जैसे शख्स से उन्हे पर्दे पर इस तरह के ख्यालात की उम्मीद नहीं थी। इसके बाद इकबाल ने इस खत को ध्यान में रखते हुए औरतों की आजादी की हिमायात करते हुए एक शेर लिखा।

गिला-ए-जोर ना हो, शिकवा-ए-बेदाद ना हो
इश्क आजाद है, क्यों हुस्न भी आजाद ना हो।

‘मुस्लिम हैं हम वतन हैं सारा जहां हमारा’

इकबाल के बारे में सबसे ज्यादा दिल तोड़ने वाला अगर उनके चाहने वालों के लिए कुछ है, तो वो है उनका एक मुस्लिमों का शायर बन जाना। राम को इमाम कहने वाला शायर, हिन्द के लिए हरपल मरने वाला शायर, मजहबी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहने वाला शायर मुस्लिमों की बात करने लगता है।

‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां’ लिखने वाला इस तराने को ‘मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा’ में बदल देता है। उन्हें हिन्द की धरती नापाक नजर आने लगती है। वो शेर लिखता है।

करदे फकत इशारा अगर शाहे खुरासान
सजदा न करूं हिंद की नापाक जमीन पर

इकबाल को सबसे पहले पाकिस्तान की मांग करने वालों में माना जाता है। हालांकि लाहौर हाइकोर्ट के जज रहे उनके बेटे जावेद इकबाल और अल्लामा इकबाल पर रिसर्च करने वाले ज्यादातर लोग इस बात को नकारते हैं। इनका मानना है, इकबाल अकलियत के लिए कुछ खास सहूलियतें और हुकूक चाहते थे ना कि पाकिस्तान।

इकबाल की शायरी मे राम की जगह महमूद गजनवी के आने पर उनका बचाव करने वाले विद्वानों का मानना है, कि इसके लिए उस समय के हालात भी जिम्मेदार थे। जिसमें कांग्रेस में दक्षिणपंथियों के दखल के बाद मुस्लिमों का अलग-थलग पड़ना और कई कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों की बढ़ती ताकत थी।

इकबाल 1937 में इस दुनिया-ए-फानी को अलविदा कह गए। लेकिन उनकी शायरी आज भी उतनी ही जिंदा लगती है, जितनी अंग्रेजों के शासन में। उनका एक शेर तो आज के हालात में बहुत ही याद आ रहा है।

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा।।


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