‘अ बैड गर्ल’ या ‘एक बुरी लड़की’ का जिÞक्र कॉलेज के दिनों में असाइनमेंट के एक टॉपिक के तौर पर हमारे सामने आया था।
कोर्स का नाम था ‘विजुअल कल्चर और वनार्कुलर’
आम तौर पर की जाने वाली तमाम अनाप शनाप बातों को, गैरकानूनी कही जा सकने वाली आदतों और कुछ और चीजों के दरमियां हमने ‘एक बुरी लड़की’ का टॉपिक एक एजुकेशनल पोस्टर के लिए लिया।
क्योंकि यह पहली बार था, इसके बारे में कभी सुना नहीं गया था और हास परिहास के साथ काम करने के लिए हमें एक मौका मिला था।

इसलिए एक डिजाइनर के तौर पर हमारे लिए यह चुनौतीपूर्ण भी था। हमें इस बात का जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि यह शुरूआत इस तरह से एक जबर्दस्त चलन का रूप ले लेगी।
तो सवाल उठा कि आखिर ‘एक बुरी लड़की’ कौन होती है? हम कुछ विचारों के साथ आए और उनमें से कई तो हमारे लिए अजीबोगरीब थे।
लेकिन ये वो बातें थीं जो हमारे अनुभवों का हिस्सा थीं, जिनके बारे में लोग सुनते थे या समाज में जिन्हें देखा जाता था।
उनमें से 16 पर विचार करने के बाद हमने से इसे कम करके 12 कर दिया। कुछ विचार ऐसे भी थे- ‘कंडोम खरीदना’ या बस ‘घर के बाहर देर तक रहना।’

‘बुरी लड़की’
‘ज्यादा खाने वाली’ या ‘बहुत कम खाने वाली’ वाली लड़की का जिÞक्र हमारे समाज में कुछ इस तरह से किया जाता है मानो हर कोई लड़की को संतुलित होने की नसीहत दे रहा हो।
यानी लोग मानते हैं कि बेहद दुबली पतली होना या मोटी होना ‘बुरी लड़की’ के लक्षण हैं।
एक डिजाइनर के तौर पर हमारा काम कुछ ऐसा बनाना था जो किसी एजुकेशनल पोस्टर की तरह लगे।
जब हमारे पोस्टर को जबरदस्त प्रचार मिला, हमने देखा कि उसे कई तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं। आप चाहें उनसे नफरत करें या फिर मोहब्बत।
यह इस बात पर निर्भर करता था कि कोई इसे किस तरह से देखता है।

लोकप्रियता

स्तुति कोठारी का गर्ल गैंग

कुछ लोगों को यह एक सच्चाई लगी या फिर एक बार फिर से सरकार की ओर से कुछ नया और विवादास्पद लगा।
हम बहुत खुश थे लेकिन ठीक इसके साथ इस पोस्टर को मिल रही प्रतिक्रियाओं और लोगों की नाराजगी पर हमें हंसी भी आ रही थी।
मेरे लिए ‘एक बुरी लड़की’ का विचार अस्तित्व नहीं रखता था। जिस लम्हे हमने कोई बात रखी, हमने उसे एक परिभाषा भी दी और उसकी हद भी तय की।
इसे मिली जबरदस्त लोकप्रियता के पीछे शायद ये वजह रही होगी क्योंकि लोग खुद को इससे जोड़ पा रहे थे।

समाज में ‘खराब’ लड़की
सच तो ये है कि हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसके ज्यादातर तौर तरीके लिंग के आधार पर तय किए जाते हैं और इसे लेकर लोगों की मान्यताएं हैं।
ऐसा क्यों होता है कि जब कोई औरत किसी मर्द की तरह ही कोई काम करती है तो उसे अलग तरीके से देखा जाता है? वह गोवा क्यों नहीं जा सकती?
और उसके लिए किसी मर्द को घूरना गलत क्यों है जबकि मर्द औरतों को देखकर हमेशा लार टपकाते रहते हैं? क्या सिर्फ यही बात कि उसके पास स्तन हैं और सिर्फ इसी से वह समाज में ‘खराब’ हो जाती है?
यह पोस्टर समाज में चली आ रही परिपाटी पर एक तरह की प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आया। इसे एक्टिविज्म के तौर पर भी देखा गया। ये उससे बहुत अलग था जो हमने शुरू में सोचा था।
स्तुति कोठारी
बीबीसी हिंदी डॉटकॉम


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