7 जनवरी 2015 को फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली हेब्दो’ के कार्यालय में घुस कर दो नकाबपोश आतंकवादियों ने अंधाधुंध पफायरिंग करते हुए आठ पत्रकारों सहित 11 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। खुद को इस्लाम का ठेकेदार बताने वाले इन आतंकवादियों की शिकायत थी कि इस पत्रिका ने पैगंबर हजरत मोहम्मद के आपत्तिजनक कार्टून प्रकाशित किए थे। इससे कुछ ही दिन पूर्व पेशावर में तहरीक-ए-तालिबान नामक संगठन ने 150 स्कूली बच्चों का कत्ल कर दिया… दुनिया के अनेक देशों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस्लामी आतंकवादियों द्वारा ऐसे अनेक हादसों को अंजाम दिया गया है और इस तरह की घटनाओं में लगातार वृद्धि होती जा रही है… पत्रकार आंद्रे वेतचेक ने इस लेख में उन कारणों की तलाश की है जिन्होंने इस्लामी आतंकवाद को पैदा किया और पाला पोसा…

अब से तकरीबन 100 साल पूर्व यह सोचना कल्पना से परे था कि कुछ मुसलमान नौजवान किसी कैफे अथवा बस या ट्रेन में घुसेंगे और आत्मघाती दस्ते के रूप में काम करते हुए दर्जनों लोगों की जान ले लेंगे। यह भी नहीं सोचा जा सकता था कि वे पेरिस की किसी पत्रिका के दफ्तर में जाकर सारे कर्मचारियों का सपफाया कर देंगे। अगर आप एडवर्ड सईद के संस्मरणों को पढ़ें या पूर्वी येरुशलम के बुजुर्गों से बातचीत करें तो यह बात साफ हो जाएगी कि फिलिस्तीनी समाज किसी जमाने में बेहद धर्म निरपेक्ष और सहनशील था। इसके सरोकार धर्मिक कठमुल्लावाद की बजाए जीवन, संस्कृति और यहां तक कि पफैशन से ज्यादा संबंधित थे। यही बात सीरिया, इराक, ईरान, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों के मुस्लिम समाजों के बारे में भी कही जा सकती है। पुरानी तस्वीरें इसकी गवाह हैं। यही वजह है कि पुरानी तस्वीरों को आज बहुत ध्यानपूर्वक बार-बार देखने और समझने की जरूरत है।

इस्लाम महज एक धर्म नहीं है। यह एक व्यापक संस्कृति भी है जो दुनिया की पुरातन संस्कृतियों में से एक है और जिसने मानव सभ्यता को कापफी समृद्ध किया है। इसने चिकित्सा के क्षेत्रा में भी अनेक आविष्कारों को जन्म दिया है। मुसलमानों ने शानदार कविताएं लिखी हैं और खूबसूरत संगीत दिए हैं। इन्होंने दुनिया के कुछ अत्यंत प्राचीन सामाजिक संरचनाओं को भी विकसित किया है जिनमें कुछ शानदार अस्पताल और मोरक्को के यूनिवर्सिटी ऑफ अलकराबियन जैसे विश्वविद्यालय भी हैं।

अनेक मुस्लिम राजनीतिज्ञों के लिए ‘सामाजिक’ होने का विचार बहुत नैसर्गिक रहा है और अगर पश्चिमी देशों ने इन मुस्लिम देशों की वामपंथी सरकारों का तख्ता पलटकर लंदन वाशिंगटन और पेरिस के चहेते पफासिस्टों को सत्तासीन नहीं किया होता तो ईरान, मिस्र और इंडोनेशिया सहित तकरीबन सभी मुस्लिम देशों में आज या तो समाजवादी सरकारें होतीं या मध्यमार्गी तथा धर्मनिरपेक्ष लोगों के नेतृत्व में देश की सत्ता होती।

इतिहास को देखें तो अतीत में ढेर सारे मुस्लिम नेताओं ने पश्चिमी देशों द्वारा दुनिया को नियंत्रित किए जाने का विरोध् किया और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति अहमद सुकर्णों सहित अनेक राजनेता कम्युनिस्ट पार्टियों और कम्युनिस्ट विचारधरा के काफी नजदीक पाए गए। सुकर्णों ने तो गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नाम से विश्व स्तर पर एक साम्राज्य विरोधी आंदोलन ही खड़ा किया जिसका 1955 में इंडोनेशिया के बांदुंग में पहला सम्मेलन हुआ। यह प्रवृत्ति रूढ़िवादी और अभिजनमुखी ईसाइयत के बिल्कुल विपरीत थी जो प्रायः फासिस्ट शासकों और उपनिवेशवादियों, राजाओं और कुलीन व्यापारियों के निकट अपने को पाती थी। सामाज्यवादियों के लिए मध्य पूर्व में अथवा साधन संपन्न इंडोनेशिया में लोकप्रिय प्रगतिशील, मार्क्सवादी मुस्लिम नेताओं का सत्ता में बने रहना कभी भी स्वीकार्य नहीं था। उन्हें लगता था कि अगर वे अपनी प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल खुद ही अपने देश की जनता का जीवन स्तर उन्नत करने में लगा देंगे तो साम्राज्यवादियों और उनके बड़े-बड़े निगमों के लिए कौन सा काम बचा रहेगा। इस पर किसी भी तरह रोक लगानी ही चाहिए। इस्लाम में फूट डालना जरूरी है और इसके अंदर ऐसे तत्वों की घुसपैठ करानी ही चाहिए जो कट्टरपंथी और कम्युनिस्ट विरोधी हों और जिनका जनता के कल्याण से कोई सरोकार न हो।

आज के इस्लाम में जो रेडिकल आंदोलन दिखाई दे रहा है वह चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों न हो, वहाबीवाद, कट्टरपंथ और इस्लाम की प्रतिक्रियावादी धरा से जुड़ा हुआ है जिसका पूरी तरह से नियंत्रण सऊदी अरब, कतर और खाड़ी देशों में वही लोग कर रहे हैं जिनका पश्चिमी देशों के साथ जबर्दस्त गठजोड़ है । डॉक्टर अब्दुल्ला मुहम्मद सिंदी के शब्दों में अगर कहें तो ‘ऐतिहासिक दस्तावेजों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि अगर ब्रिटेन की मदद न हो तो न तो वहाबीवाद का अस्तित्व रहेगा और न हाउस ऑफ सऊद का। वहाबीवाद इस्लाम के अंदर ब्रिटेन द्वारा पोषित कट्टरपंथी आंदोलन है। इसी प्रकार हाउस ऑफ सऊद को अमेरिका का संरक्षण प्राप्त है और वह भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से वहाबीवाद को ही समर्थन देता है भले ही इसका खामियाजा उसे 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के रूप में क्यों न भुगतना पड़े। वहाबीवाद एक हिंसक, दक्षिणपंथी, बेहद कट्टर, अतिवादी, प्रतिक्रियावादी, नारी विरोधी और असहिष्णु धारा है…’।

1980 के दशक में पश्चिमी देशों ने वहाबीवाद को जबर्दस्त समर्थन दिया । 1979 से 1989 के बीच अफगानिस्तान में सोवियत संघ के उलझने के बाद वहाबीवादियों को पूरी तरह हथियारों और पैसों की मदद की गयी। इस युद्ध के नतीजे के तौर पर आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से सोवियत संघ पूरी तरह ध्वस्त हो गया और अंत में इसका वजूद ही समाप्त हो गया। सोवियत सैनिकों का मुकाबला करने वाले और साथ ही काबुल में वामपंथी सरकारों के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिदीनों को पश्चिमी देशों ने भरपूर मदद दी। ये मुजाहिदीन विभिन्न मुस्लिम देशों से वहां इकट्ठे हुए ताकि ‘नास्तिक कम्युनिस्टों’ के खिलाफ वे एक धर्मयुद्ध चला सकें।

अमेरिकी विदेश विभाग के अभिलेखों के अनुसार ‘नास्तिक कम्युनिस्टों’ के खिलाफ तथाकथित अफगान अरबों और विदेशी लड़ाकों ने जेहाद छेड़ दिया था। इनमें काफी मशहूर था एक युवा सऊदी जिसका नाम ओसामा बिन लादेन था और जिसने आगे चलकर अलकायदा नामक ग्रुप का गठन किया।’

पश्चिमी देशों ने अनेक इस्लामिक देशों में अलकायदा के तर्ज पर अनेक संगठनों के बनने में मदद पहुंचायी और हाल में इसने आईएसआईएस नामक संगठन को भी जन्म दिया। आईएसआईएस एक ऐसी अतिवादी सेना है जिसका जन्म सीरिया-टर्की और सीरिया-जॉर्डन की सीमा पर बने शरणार्थी शिविरों में हुआ और जिसे पैसों और हथियारों की मदद पहुंचाकर नाटो तथा पश्चिमी देशों ने बशर-अल-अशद की धर्मनिरपेक्ष सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए सीरिया भेजा।

इस तरह की हरकतों से पश्चिमी देशों को अपने अनेक मकसदों में सपफलता मिलती थी। ये देश अपने उन दुश्मनों के खिलाफ इनका इस्तेमाल करते थे जो अभी भी दुनिया पर पूरा-पूरा दबदबा स्थापित करने की साम्राज्यवादी मंशा के रास्ते में रुकावट बनते थे। इसके बाद समय बीतने के साथ ये चरमपंथी सेनाएं इन देशों के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो जाती थीं और फिर इनकी आड़ लेकर ये लोग ‘ आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ जैसे अभियान की शुरुआत करते थे और अपने हमलों को न्यायोचित बताते थे। इसके बाद अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं तथा टेलीविजन की स्क्रीन पर इन मुस्लिम चरमपंथियों की तस्वीरें दिखायी जाती थीं और फिर पश्चिमी प्रचार आता था जिसमें बताया जाता था कि ये लोग कितने खतरनाक हैं और इनसे निपटने के लिए पश्चिमी देश कितना महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप इन देशों को किसी भी देश या संगठन के खिलाफ जासूसी करने की पूरी तरह वैधता मिल जाती थी, प्रतिरक्षा के नाम पर अपने बजट बढ़ाने का बहाना मिल जाता था और उन देशों के खिलाफ युद्ध छेड़ने की मुहिम शुरू हो जाती थी जो पश्चिमी देशों की नीतियों का विरोध करते हों।

हैरानी होती है कि किस तरह एक शांतिपूर्ण और रचनात्मक सभ्यता को, जिसका झुकाव समाजवाद की तरफ था, अचानक पथभ्रष्ट कर दिया गया और किस तरह धर्मिक और वैचारिक स्तर पर गलत तत्वों की उसमें घुसपैठ करायी गयी और उसका ऐसा रूपांतरण कर दिया गया जो आज आतंकवाद और असहिष्णुता का प्रतीक बन गया है। आज हालात बेहद बदतर हो गए हैं। इन नीतियों की वजह से असंख्य लोग मारे जा चुके हैं और अभूतपूर्व बर्बादी हो चुकी है। इस नजरिए से अगर देखें तो इंडोनेशिया सबसे बड़ा उदाहरण है जिससे पता चलता है कि किस तरह प्रगतिशील मुस्लिम मूल्यों का योजनाबद्ध ढंग से सफाया किया गया।


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