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रमज़ान, इस्लामिक केलिन्डर का नवा महीना, जिसमे पूरी दुनिया के मुस्लमान रोज़े रखते हैं. इस्लाम धर्म में इस महीने के रोज़े सभी मुसलमानो पर फ़र्ज़ या ज़रूरी होते हैं. और यह रोज़े इस्लाम धर्म के पांच पिल्लर्स में से एक हैं.
यह महीना 29 से 30 दिन का होता हैं. इस्लाम धर्म में इस महीने की बहुत अहमियत और फ़ज़ीलत हैं, बताया जाता हैं कि रमज़ान के इस महीने में पवित्र किताब क़ुरआन को पैगम्बर मोहम्मद, सल्लाहो अलेह वस्सलम, के ऊपर नाज़िल किया गया था और इसी महीने में यह क़ुरआन मुकम्मल या पूरी हुई थी.

रमज़ान शब्द की उत्पत्ति-
रमज़ान शब्द अरबी के रमिदा या अर-रमदा से बना है जिसका मतलब चिलचिलाती धूप और सूखापन है. रमज़ान के रोज़े सभी व्यस्क मुसलमानो पर अनिवार्य हैं सिवाए उनके जो सफर पर हो, जो माँ बन्ने वाली हो, किसी बीमारी में मुब्तिला हो या फिर बच्चे को दूध पिलाना हो या माहवारी रक्तस्राव के दौरान हो.

 कैसे रखे रोज़े-

रमज़ान के रोज़े अनिवार्य हैं. यह रोज़ा सुबह सूरज के आफताब या निकलने ये पहले शुरू होता हैं और सूरज के गुरूब या डूबने के बाद ख़त्म होता हैं. रोज़े के दौरान कुछ भी खाना-पीना जायज़ या सही नहीं हैं. रोज़े कि हालत में अलकोहल लेना, स्मोकिंग करना या सेक्स करना जायज़ नहीं इन सब कमो से रोज़ा टूट जाता है. वैसे तो इस्लाम धर्म में यह सभी चीज़े, जैसे शराब पीना और नाजायज़ तरीके से यौन सम्बन्ध बनाना हराम हैं.

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क़ुरान की हिदायत-

इस्लामिक धर्म की पवित्र किताब क़ुरान में अल्लाह फरमाता हैं कि, “हमने ये किताब रमज़ान के महीने में उतारी जो मानव जाती के लिए एक मार्गदर्शन हैं,और इस किताब में मार्गदर्शन के स्पष्ट सबूत हैं,और जो भी तुम सब में मौजूद हैं उसको रोज़े रखने है, सिवाए उनके जो यात्रा पर और वो जो अपने दिन पूरे कर रहे हैं. अल्लाह तुम्हारी भलाई चाहता हैं, और तुमको उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए”. क़ुरान 2:185 

हदीस की रोशनी में-

यह माना जाता है कि यह किताब रमज़ान के महीने में पैगम्बर मोहम्मद, सल्लाहो अलेह वस्सलम, के ऊपर उत्तरी गयी, जोकि सबसे अच्छ वक़्त समझा जाता है. हदीस (पैगम्बर मोहम्मद, सल्लाहो अलेह वस्सलम, की बताई हुई बात) के मुताबिक सभी आसमानी किताबें रमज़ान के महीने में ही उतारी गयी.
अबु हुरैरह (पैगम्बर मोहम्मद के साथी) बताते हैं कि “पैगम्बर मोहम्मद ने फ़रमाया कि जब रमज़ान शुरू होते हैं तब जन्नत (स्वर्ग ) के दरवाज़े खुल जाते है और जहन्नम (नर्क) के दरवाज़े बंद हो जाते हैं. और शैतान ज़ंजीरो से जकड़ दिए जाते हैं”. सहीह अल-बुखारी जिल्द 1, पेज 255 और सहीह अल-मुस्लिम, जिल्द 1, पेज 346

“पैगम्बर मोहम्मद, सल्लाहो अलेह वस्सलम, बताते हैं कि जो कोई रमज़ान के पूरे ईमान के साथ रोज़े रखता है और अल्लाह से उसके बदले अपने पिछले गुनाहों कि माफ़ी मांगता हैं अल्लाह उसके सरे गुनाहों को माफ़ कर देता हैं”.सहीह अल-बुखारी जिल्द 1, पेज 255 और सहीह अल -मुस्लिम, जिल्द 1, पेज 259

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कैसे करे इफ्तार-

यह रोज़ा सूरज के डूबने के बाद मगरिब की सलाह के साथ इफ्तार करके तोड़ा जाता हैं. रोज़ा तोड़ने या इफ्तार करने के लिए सबसे पहले खजूर खायी जाती है, जैसा कि सुन्नत (the doings of prophet Mohammad ) तरीका हैं, बताया जाता हैं कि पैगम्बर मोहम्मद, सल्लाहो अलेह वस्सलम, अपना रोज़ा तीन खजूर खाने के साथ तोड़ा करते थे.

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वैज्ञानिक तथ्य-
जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और एक बड़े रेसर्चेर मार्क मत्तसोंं ने बताया कि “फास्टिंग या रोज़ा हमारे दिमाग के लिए एक अच्छी चीज़ है” और यह हमारे दिमाग को बॉलस्टर देता हैं.

Web-Title:Importance of Ramazan in Islam

Key-Words: Ramadan, Mohammad, fasting, 30 days, quran, hadith


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