पत्रकारिता के निचली सीढ़ी से लेकर ऊपरी पायदान तक बैठे लोगों से वास्ता रहा है। इन्हीं लोगों के बीच पिछले दस बारह साल गुज़रे हैं। मीडिया के नाम पर तक़रीबन रोज़ ही गाली खाने को मिलती हैं। दलाल, बिकाऊ, जाहिल, मूर्ख, संघी… मीडिया के खाते में रोज़ाना नई नई उपमाएं जुड़ रही हैं।

हालांकि जैसा माहौल है उसमें सफाई देने या बचाव करने की गुंजाईश बहुत कम है फिर भी आम लोगों की सहूलियत के लिए एक आसान सा उदाहरण है। आम आदमी के लिए होमगार्ड, कांस्टेबल और दरोग़ा से लेकर आईजी, एडीजी, डीजी तक सभी पुलिसवाले हैं। जो लोग सिस्टम से वाक़िफ हैं वो जानते हैं कि होमगार्ड से डीजी के स्तर तक जाते जाते कार्यशैली, भ्रष्टाचार और इंसाफ के मायने बदल जाते हैं। दारोग़ा से ऊपर के स्तर पर शायद ही कोई अधिकारी दस पांच रुपये पर हाथ फैलाए या तथ्यों की अनदेखी करे मगर लोग सीधे कहते हैं पुलिसवाले दस पांच रुपये में बिकते हैं।


हां इतना ज़रूर है ऊपरी स्तर पर अधिकारी राजनीतिक निष्ठा, पदोन्नति के लालच और नेताओं के क़रीबी दिखने के चक्कर में स्तरहीन हरकत कर दें मगर तब भी अधिकतर इस तरह की बीमारी से दूर रहते हैं। कहने का मतलब इतना ही है कि होमगार्ड और डीजी के स्तर में फर्क़ करना सीखीए। सबको एक डंडे से मत हांक दीजीए।


इधर मीडिया घरानों को भी सोचना होगा। जिस तरह का जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाई भतीजावाद इंडस्ट्री में है वो कुल मिलाकर सबकी छवि ख़राब कर रहा है। इस चक्कर में झोलाछाप और नीम हकीम टाईप लोग ठीक ठाक रुतबा पा जाते हैं। जिन्हें होमगार्ड होना चाहिए वो अगर दरोग़ा बन जाएंगे तो भास्कर जैसे कारनामे आम हो जाएंगे।


जिन लोगों को ख़ुमैनी और ख़ामनेई का अंतर जाने दीजीए एक चांद सितारा बने साधारण कत्तर और पाकिस्तान के झंडे में फर्क़ नहीं मालूम वो रोज़ाना संपादकों के पिटने का सामान ही करेंगे।


आमतौर पर अति-उत्साही अधकचरा डिग्रीधारी निजी संबंधों के बल पर नौकरी पा जाते हैं और इस तरह के कारनामे अंजाम देते हैं और गाली पूरी इंडस्ट्री खाती है। बेहतर है संस्थान इस तरह के लोगों से किनारा करें वरना वो दिन दूर नहीं जब लोगों का ग़ुस्सा गालियों से बढ़कर मारपीट और ख़ून ख़राबे की हद तक पहुंच जाएगा। समय रहते नहीं जागे तो संभलने का मौक़ा भी नहीं मिलेगा।

सैयद जैगम मुर्तजा


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