बहुत दबाव है “रोहित वेमुला” पर कुछ लिखो दादा हर बार इनबाक्स बजता है ! क्या लिखूं यार ? वो जो लिख गया क्या वो काफी नहीं ?

अब लिखूंगा तो दलित इंटलीजेंसिया को तीखी लगेगी पर सुन ही लो ! अंबेडकर बाबा ने कहा था- “शिक्षित बनो ! संगठित बनो ! संघर्ष करो !

अब दलित शिक्षित भी हुए, अपनी गोल में संगठित भी हुए पर जब संघर्ष की बारी आयी तो बांभनवाद की राह पर चलकर उन्हीं ताकतों के हथियार बने जिन्हें पानी पी पीकर गरियाते थे गुजरात दंगों की लिस्ट देख लो वहां दंगाइयों में भीड़ का प्रतिशत क्या था मरने वालों में सवर्ण दलित रेश्यो क्या था ? दूर क्यों जाते हो यू पी में भाजपा को 73 सीट दिलाने में बड़ा वोट किसका था ?

अब दक्षिण के दलित बहुल राज्यों से ऐसी खबरें आती हैं तो मैं क्या समझूं ? गौड़ा समझूं या लिंगायत समझूं ? मेले ठेलों की भीड़ आप लोग हो चपटा आड़ा तिलक आप लोग हो जब इतनी ताकत हो तो कमजोर क्यूं हो ?

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बिहार में- “रहे दा मलिकार ! छोड़ दा मलिकार ! की चीत्कार थी लक्ष्मणपुर बाथे, शंकरबिगहा, बथानी टोला…. कितने नाम लूं जब कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में प्रतिकार हुआ तो सवर्णो को समझ आया ना ? कैथल कलां की औरतें याद हैं ना ? आंध्र-तेलगांना का जन कवि ‘गदर’ याद है ना ?

आज सब कुछ तो दलित अपनी रणनीति बना लेंगे पर कम्युनिष्टों को सबसे पहले गरियाऐंगे ! और कोई तरीका है इस देश में दलित, नारी, किसान, मजदूर, अल्पसंख्यक की लड़ाई की सही दिशा का ?

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रही बात आत्महत्या की तो बाबा अंबेडकर के नारे को फिर देखो ! और ब्राह्मणवाद की सबसे बड़ी ताकत कौन है ये खुद देख लो ! जातीय जनगणना के बाद साफ हो गया ना कि ये 15% अगर खुद को 100% वोट भी करे तो सत्ता नहीं पा सकता !

तो बोल (85) पिचासी
तू मोहरा सियासी ?

दीप पाठक – लेखक वरिष्ठ पत्रकार है
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