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इशरत जहां आतंकी थी या नहीं ये अब मुद्दा है ही नहीं। आपने उसे मार डाला… उसके पास हथियार मिल गए… आपका केस क़ानूनन सही हो गया (कैसे, क्यों, किसलिए जैसी बातें बेमायने हो गईं)…आप सच्चे, बाक़ी सब झूठे… मामला ख़त्म। असल मुद्दा ये है कि क्या वो कोर्ट सच्ची है जो जांच करा रही थीं और क्या एन्काउंटर करने वाले सत्यवादी और मानवता के रखवाले हैं? मुद्दा ये है कि जब आप और पुलिस ही अपराधी और सज़ा तय कर सकते हैं तो ये अदालतें क्यों क़ायम हैं?

एक बात समझ लीजीए। संविधान और न्याय व्यवस्था से आपके मुंह फेरने से हमें कोई नुक़सान नहीं है बल्कि इससे व्यवस्था में हमारी बदयक़ीनी को आपऔर पुख़्ता कर रहे हैं। हम पहले ही तरह कह रहे हैं भारतीय न्याय व्यवस्था और तंत्र को दीमक लग गया है। बाबरी, एएमयू, जामिया, मलियाना, हाशिमपुरा, भागलपुर, असम, मुरादाबाद, अलीगढ़, मुंबई, गुजरात जैसे मामले हमारी बेयक़ीनी को मज़बूती देते चले जाते हैं। और तो और लक्षमणपुर बाथे, सलमान का हिट एंड रन, 1984 का दिल्ली, कंधमाल ये सब भी बताते हैं कि अदालतों की अंधी देवी का तराज़ू सोने चांदी और सत्ता की तरफ झुकता है।


हमें आपकी बात बहुत पहले समझ जानी चाहिए थी कि हमें कोर्ट की तरफ देखना बंद कर देना चाहिए। वैसे भी सबकुछ पाकर जब आपका यक़ीन इनमें नहीं तो हमें ही क्यों हो? हमने तो इसी कोर्ट से दंगाईयों को रिहा होते, तड़ीपार बदमाशों को क्लीनचिट मिलते, घोषित अपराधियों को ज़मानत और पैरोल मिलते देखा है। कैसे मिलती है ये आपको हमसे बेहतर पता है।


इन अदालतों में कैसे सज़ा दिलाई जाती है… कैसे सरकारी वकील बिरयानी पकवाते हैं… किस तरह आरोपियों के मुक़द्दमे लड़ने से वकील इंकार करते हैं… कैसे अभियोजन और पक्षकार के वकील मामले फिक्स करते हैं… कैसे गवाह पलटते हैं और कैसे लाशें अपना क़त्ल ख़ुद कर लेती हैं? ये अब बताने समझने की बातें नहीं रहीं। ये लोगों की आदत में शुमार हो गई हैं।


बस अब आप न्याय का ढिंढोरा पीटना बंद कीजीए। सीधे कहिए न्याय वही है जो समर्थ देने को राज़ी है। अदालत वही है जो सरकार है…बस इन क्लीन चीट के कारख़ानों को बंद कीजीए। और हमसे सीधे कहिए… अब आपको कुछ नहीं मिलेगा। आपका इस ज़मीन, आसमान में कुछ भी नहीं।

  • सैयद जैगम मुर्तजा 

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